
बस्ती के हर्रैया स्थित मदही ग्राम में मनोरमा नदी का अस्तित्व खतरे में है। विकास और स्वच्छता अभियानों के दावों के बीच, कभी निर्मल और जीवनदायिनी मानी जाने वाली यह नदी अब गंदगी, जलकुंभी और गाद की परतों में सिमटती नजर आ रही है। नदी का प्राकृतिक प्रवाह लगभग थम चुका है और घाटों पर पानी की जगह जलकुंभी का साम्राज्य दिखाई देता है। सतह पर जमी काई, प्लास्टिक कचरा और सड़ांध ने इसे बहती नदी से अधिक ठहरे हुए तालाब का रूप दे दिया है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि स्थानीय लोगों के अनुसार, अब यह पानी नहाने तो क्या, आचमन करने योग्य भी नहीं रह गया है। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से सफाई और ड्रेजिंग कार्य न होने के कारण नदी में सिल्ट और कचरे का अंबार लग गया है। प्रशासन की अनदेखी से समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। मनोरमा नदी का इस क्षेत्र में गहरा धार्मिक महत्व है और श्रद्धालु वर्षों से यहां स्नान और पूजन के लिए आते रहे हैं, लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए लोग पानी को छूने से भी हिचकिचा रहे हैं। ठहरा हुआ दूषित पानी मच्छरों और बैक्टीरिया का केंद्र बन गया है, जिससे संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ गया है। गांव के मवेशी भी इसी नदी पर निर्भर हैं, परंतु प्रदूषित पानी उनके स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक साबित हो रहा है। स्थानीय निवासी सुशील पांडे, अनुप पांडे, राजन पांडे, इंद्रमणि पांडे, अजय पांडे और अनिल कुमार सहित अन्य ग्रामीणों ने प्रशासन के प्रति नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि कई बार शिकायत के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र सफाई, जलकुंभी निष्कासन और पुनरुद्धार कार्य शुरू नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ी के लिए यह नदी केवल एक सूखी स्मृति बनकर रह जाएगी।










































