सनातन परंपरा में सूर्य ग्रहण को महज एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अवसर माना जाता है। साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण फरवरी में लगा था, लेकिन वह भारत में दिखाई नहीं दिया था। अब सबकी नजरें साल के दूसरे सूर्य ग्रहण पर टिकी हैं, जो 12 अगस्त की रात को शुरू होगा और 13 अगस्त की सुबह समाप्त होगा। विशेष बात यह है कि यह ग्रहण ‘हरियाली अमावस्या’ के दिन पड़ रहा है और भारत में दिखाई देने के कारण यहाँ इसका धार्मिक प्रभाव और सूतक काल पूरी तरह मान्य होगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य ग्रहण शुरू होने से ठीक 12 घंटे पहले सूतक काल लग जाता है। इस दौरान मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और किसी भी प्रकार की मूर्ति पूजा या शुभ कार्य वर्जित होते हैं। सूतक लगने से पहले ही खाने-पीने की चीजों में तुलसी के पत्ते डाल दिए जाते हैं ताकि वे शुद्ध रहें। ग्रहण के समय भोजन करना, नुकीली वस्तुओं का उपयोग करना और मांगलिक कार्य जैसे विवाह या गृह प्रवेश करना अशुभ माना जाता है। इस अवधि में मन को शांत रखकर केवल मानसिक जप करना सबसे अधिक फलदायी होता है।
ग्रहण के दौरान गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र या सूर्य देव के मंत्रों का मन ही मन स्मरण करना नकारात्मक ऊर्जा से बचने का सबसे उत्तम तरीका है। जैसे ही ग्रहण समाप्त होता है, पवित्र नदियों या घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान करने की परंपरा है। स्नान के बाद पूरे घर की शुद्धि की जाती है, दीपक जलाकर पूजा की जाती है और सामर्थ्य अनुसार जरूरतमंदों को दान दिया जाता है। दान करने से ग्रहण के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है।
ग्रहण काल में गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। इस समय वाद-विवाद से दूर रहना और सकारात्मक विचार रखना अनिवार्य है। चूँकि यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा, इसलिए सूतक के नियमों का पालन करना उन सभी के लिए जरूरी है जो आध्यात्मिक और धार्मिक मान्यताओं में विश्वास रखते हैं। अपनी शुद्धि और मानसिक शांति के लिए इन प्राचीन नियमों का पालन करना हमेशा लाभकारी सिद्ध होता है।

































