इस साल रूठ जाएगी बारिश? जानिए खेती और मौसम पर होने वाला बड़ा असर
दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिक इस समय प्रशांत महासागर में हो रही हलचलों को लेकर हाई अलर्ट पर हैं। ताजा संकेतों के अनुसार, साल 2026 की गर्मियों तक अल नीनो (El Niño) बनने की संभावना बेहद मजबूत हो गई है। अंतरराष्ट्रीय मौसम मॉडल्स के मुताबिक, यह अल नीनो सामान्य नहीं, बल्कि ‘सुपर अल नीनो’ का रूप ले सकता है। इसका सीधा असर भारत के मानसून पर पड़ सकता है, जो हमारी खेती और अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। प्रशांत महासागर के पानी का असामान्य रूप से गर्म होना भारतीय किसानों के लिए चिंता का विषय बन गया है क्योंकि इससे बारिश कम होने और सूखे की स्थिति बनने का खतरा रहता है।
हालांकि, इस डरावनी तस्वीर के बीच हिंद महासागर एक उम्मीद की किरण बनकर उभरा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि हिंद महासागर में ‘पॉजिटिव आईओडी’ (Indian Ocean Dipole) बनता है, तो यह अल नीनो के विनाशकारी प्रभाव को काफी हद तक संतुलित कर सकता है। आईओडी तब बनता है जब हिंद महासागर का पश्चिमी हिस्सा गर्म और पूर्वी हिस्सा ठंडा हो जाता है, जिससे मानसून को अतिरिक्त ताकत मिलती है। यदि अल नीनो और पॉजिटिव आईओडी दोनों सक्रिय होते हैं, तो स्थिति 1997-98 जैसी हो सकती है, जब भारी अल नीनो के बावजूद भारत में मानसून सामान्य रहा था।
खेती और फसल की दृष्टि से देखें तो आने वाले महीने किसानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाले हैं। अल नीनो के कारण उत्तर और मध्य भारत में बारिश की कमी हो सकती है, लेकिन दक्षिण भारत के लिए एक अच्छी खबर भी है। कुछ अंतरराष्ट्रीय मॉडल्स के अनुसार, अक्टूबर से दिसंबर के दौरान आने वाले उत्तर-पूर्वी मानसून में तमिलनाडु और आसपास के इलाकों में सामान्य से अधिक बारिश हो सकती है। यह पानी की किल्लत से जूझ रहे दक्षिणी राज्यों के लिए राहत भरी खबर साबित हो सकती है।
ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में मौसम की सटीक गणना करना पहले से कहीं ज्यादा जटिल हो गया है। समुद्रों के लगातार गर्म होने से अल नीनो का व्यवहार समझना वैज्ञानिकों के लिए भी एक चुनौती बना हुआ है। फिर भी, आधुनिक सैटेलाइट और मॉडल्स पल-पल की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। अंततः यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशांत महासागर का अल नीनो भारी पड़ता है या हिंद महासागर का आईओडी भारतीय मानसून को बचा लेता है। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे अगले कुछ महीनों के अपडेट्स पर पैनी नजर रखें ताकि अपनी फसलों का उचित प्रबंधन कर सकें।




































