उत्तर प्रदेश के सबसे चर्चित और रोंगटे खड़े कर देने वाले ‘बिकरू कांड’ की गूँज आज भी प्रदेश की सियासत में सुनाई देती है। लेकिन इस बार चर्चा किसी एनकाउंटर या खूनी संघर्ष की नहीं, बल्कि एक माँ की बेबसी और उस बेबसी में सहारा बनने वाले एक हाथ की है। बिकरू कांड के बाद कानूनी दांव-पेंचों और जेल की सलाखों के पीछे फंसी खुशी दुबे की माँ गायत्री तिवारी ने हाल ही में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने पत्थर दिल इंसान को भी भावुक कर दिया। गायत्री तिवारी ने अखिलेश यादव को न केवल अपना रक्षक बताया, बल्कि उन्हें दुआएं देते हुए यहाँ तक कह दिया कि “ऐसा बेटा भगवान हर माँ को दे।” यह बयान सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल रहा है और इसने यूपी की राजनीति में एक नई भावनात्मक बहस छेड़ दी है।
अंधेरी रातों में मिला ‘उम्मीद का सूरज’
बिकरू कांड के बाद जब खुशी दुबे को जेल भेजा गया था, तब गायत्री तिवारी का परिवार सामाजिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट चुका था। एक तरफ समाज का तिरस्कार था और दूसरी तरफ पुलिसिया कार्रवाई का खौफ। गायत्री तिवारी ने नम आँखों से याद किया कि उस कठिन दौर में जब अपने भी साया छोड़कर चले गए थे, तब अखिलेश यादव और उनकी पार्टी ने बिना किसी शोर-शराबे के उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया था। गायत्री के अनुसार, खुशी की कानूनी लड़ाई से लेकर घर के राशन तक का ख्याल जिस तरह से रखा गया, उसने उन्हें यह अहसास कराया कि वे अकेली नहीं हैं। इसी कृतज्ञता और अपनत्व के भाव ने एक माँ के सब्र का बांध तोड़ दिया और वे अखिलेश को देखते ही फफक-फफक कर रो पड़ीं।
“अन्याय की दीवार गिराने वाले मेरे लाल”
गायत्री तिवारी ने बातचीत के दौरान प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी बेटी निर्दोष थी, फिर भी उसे राजनीति और बदले की भावना का शिकार बनाया गया। उस समय केवल अखिलेश यादव ही थे जिन्होंने सड़क से लेकर सदन तक उनकी आवाज बुलंद की थी। गायत्री ने भावुक होकर कहा, “आज अगर मेरी बेटी बाहर है और हम चैन की सांस ले रहे हैं, तो इसके पीछे इस ‘बेटे’ का हाथ है।” उन्होंने अखिलेश को अपना ‘बड़ा बेटा’ बताते हुए कहा कि सत्ता और पद तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन जो इंसानियत अखिलेश ने दिखाई है, वह उन्हें एक सच्चा जननायक बनाती है। माँ की इन निस्वार्थ दुआओं ने वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखों में नमी ला दी और यह मुलाकात पूरी तरह से गैर-राजनीतिक लेकिन बेहद आत्मीय बन गई।
यूपी की सियासत: क्या दुआएं बदलेंगी समीकरण?
राजनीतिक विशेषज्ञ इस भावनात्मक मिलन के गहरे मायने निकाल रहे हैं। कानपुर के बेहमई और बिकरू जैसे इलाकों में खुशी दुबे का मामला केवल एक कानूनी केस नहीं, बल्कि ब्राह्मण समुदाय के स्वाभिमान का मुद्दा बन गया था। ऐसे में गायत्री तिवारी का अखिलेश यादव को ‘बेटे’ जैसा सम्मान देना आगामी चुनावों में बड़े फेरबदल का संकेत हो सकता है। हालांकि, अखिलेश यादव ने हमेशा इसे मानवीय आधार पर लड़ा गया न्याय का संघर्ष बताया है। उन्होंने गायत्री तिवारी को आश्वासन दिया कि वे अन्याय के खिलाफ आखिरी दम तक उनके साथ खड़े रहेंगे। अखिलेश ने कहा कि किसी निर्दोष की माँ की आँखों में आँसू आना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शर्म की बात है और वे न्याय की इस मशाल को बुझने नहीं देंगे।
सोशल मीडिया पर वायरल और इंसाफ की पुकार
गायत्री तिवारी का यह वीडियो इंटरनेट पर आते ही लोग इसे “असली लोकतंत्र” करार दे रहे हैं। जहाँ विपक्ष इसे सहानुभूति बटोरने का जरिया कह रहा है, वहीं आम जनता इस माँ-बेटे के जुड़ाव को देखकर दंग है। खुशी दुबे की रिहाई के बाद से ही उनका परिवार लगातार समाजवादी पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा जताता रहा है। लेकिन इस बार गायत्री तिवारी का “ऐसा बेटा सबको मिले” वाला जुमला उत्तर प्रदेश की फिजाओं में एक नया नारा बनकर गूँज रहा है। अब देखना यह होगा कि एक पीड़ित माँ का यह आशीर्वाद अखिलेश यादव के राजनीतिक भविष्य को कितनी ऊंचाइयों पर ले जाता है। फिलहाल, यह साफ है कि बिकरू कांड की आग में झुलसे इस परिवार को अखिलेश के रूप में एक मजबूत कंधा मिल गया है।
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