महराजगंज: सिसवा की आबोहवा में इन दिनों राजनीति की ‘खुशबू’ कम और सरकारी डीजल के जलने की गंध ज्यादा आ रही है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के आगमन की आहट क्या हुई, सिसवा के ‘स्वयंभू’ खलीफाओं की नींद उड़ गई है। हर कोई यह साबित करने में जुटा है कि अध्यक्ष जी का सबसे सगा वही है, भले ही इसके लिए नगरपालिका की मर्यादा का गला ही क्यों न घोंटना पड़े।
*सरकारी संसाधनों की ‘शादी’: बाराती नगर पालिका, दूल्हा प्रतिनिधि!*
नगरपालिका सिसवा के संसाधनों का ऐसा ‘निजीकरण’ इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया। अध्यक्ष प्रतिनिधि गिरिजेश जायसवाल ने नगरपालिका की गाड़ियों को अपनी निजी जागीर समझ लिया है। जनता के टैक्स से खरीदी गई सीढ़ी वाली गाड़ियाँ, जो मोहल्लों की फ्यूज लाइटें ठीक करने के नाम पर ‘हाफने’ लगती हैं, आज नेताजी के विशालकाय चेहरों को आसमान की ऊंचाइयों पर टांगने के लिए ‘ओलंपिक एथलीट’ बनी हुई हैं।
ऐसा लगता है जैसे सिसवा नगरपालिका का मुख्य काम अब सफाई या जल निकासी नहीं, बल्कि ‘प्रतिनिधि चालीसा’ का प्रचार करना रह गया है।
*पद का ‘अचार’, पावर का ‘बुखार’
राजनीति के गलियारों में।
‘जनप्रतिनिधि का प्रतिनिधि’ होना आजकल एक ऐसा पद बन गया है, जिसमें जिम्मेदारी शून्य और अधिकार अनंत होते हैं। सिसवा की जनता देख रही है कि कैसे सरकारी ट्रैक्टर कूड़ा ढोने के बजाय पोस्टर ढो रहे हैं। यह नजारा देखकर ऐसा लगता है कि नगरपालिका अब एक स्वायत्त संस्था नहीं, बल्कि ‘जायसवाल एडवरटाइजिंग एजेंसी’ बन चुकी है।
*अध्यक्ष जी का स्वागत या संसाधनों की डकैती?*
प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी जी का आगमन तो एक बहाना है, असली मकसद तो अपनी धमक दिखाना है। लेकिन धमक अपने दम पर दिखाई जाती है, जनता की गाढ़ी कमाई के संसाधनों पर डकैती डालकर नहीं। सिसवा की सड़कों पर लटके ये बैनर चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि “नियम कानून आम आदमी के लिए हैं, सत्ता के गलियारों में टहलने वाले ‘प्रतिनिधियों’ के लिए तो सरकारी खजाना भी पर्सनल वॉलेट है।”
अगर पोस्टर लगाने में ही सारा अमला लगा है, तो क्या अध्यक्ष जी के जाने के बाद सिसवा का कूड़ा नेताजी खुद अपने घर ले जाएंगे?
> सत्ता के नशे में जब चश्मा ‘रंगीन’ हो जाता है, तो सरकारी और निजी का फर्क मिट जाता है। सिसवा का यह नजारा इसी ‘राजनीतिक मोतियाबिंद’ का ताजा उदाहरण है।






























