फाइलें ‘दौड़’ रही हैं, मजदूर ‘गायब’ हैं: निचलौल में मनरेगा का ‘अदृश्य’ विकास

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रिपोर्ट:गजेन्द्र गुप्त।
निचलौल (महराजगंज): सरकारें डिजिटल इंडिया और NMMS पोर्टल के जरिए भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का दम भरती हैं, लेकिन धरातल पर बैठे “कलाकार” अधिकारियों ने भ्रष्टाचार के ऐसे-ऐसे ‘सॉफ्टवेयर’ विकसित कर लिए हैं कि विज्ञान भी शर्मिंदा हो जाए। मामला निचलौल ब्लॉक के ग्राम सभा रामचंद्रही का है, जहाँ मनरेगा के तहत कागजों पर तो फावड़े चल रहे हैं, लेकिन हकीकत में मिट्टी की एक ढेरी तक नहीं खिसकी।

जादूई मस्टर रोल: काम कहीं और, फोटो कहीं और!
रामचंद्रही गांव में 11 फरवरी से ‘छौंकन के घर से दुबे जी की छावनी तक’ चकबंद कार्य के नाम पर 4 मस्टर रोल जारी किए गए हैं। सरकारी रिकॉर्ड कहता है कि यहाँ हर रोज 35 मजदूर पसीना बहा रहे हैं। लेकिन जब मीडिया टीम ने मौके पर तफ्तीश की, तो पता चला कि पसीना मजदूरों का नहीं, बल्कि फर्जीवाड़ा छिपाने के लिए जिम्मेदार लोगों का छूट रहा है।ग्रामीण मतेंद्र मौर्य, रामाशीष और विजय यादव ने बताया कि जिस रास्ते पर काम होना दिखाया जा रहा है, वहाँ 15-20 दिन पहले ही काम खत्म हो चुका है।18 फरवरी को NMMS पोर्टल पर मजदूरों की जो फोटो अपलोड की गई, उसे गूगल सर्च करने पर पता चला कि वह फोटो कार्यस्थल की नहीं, बल्कि प्राइमरी स्कूल के पास की है। यानी मजदूर स्कूल में हाजिरी बजा रहे हैं और पैसा चकबंद के नाम पर निकाला जा रहा है।

अधिकारियों का ‘एसी’ प्रेम और प्राइवेट मुंशियों का राज।
इस पूरे खेल में रोजगार सेवक नीलरतन पटेल और तकनीकी सहायक आत्माराम दुबे की भूमिका किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।
> “साहब! आप तो जानते ही हैं मनरेगा में कैसे काम होता है, हमसे क्यों कहलवा रहे हैं?”
> — धर्मेंद्र (तकनीकी सहायक का कथित सहायक)
>
सूत्रों की मानें तो तकनीकी सहायक आत्माराम दुबे जी को “धूल-धक्कड़ से एलर्जी” है, इसलिए वह स्थलीय निरीक्षण की जहमत नहीं उठाते। साहब ने एक प्राइवेट मुंशी (धर्मेंद्र) रखा हुआ है, जो साहब की तरफ से ‘फील्ड’ संभालता है। दुबे जी खुद खंड विकास अधिकारी के बगल वाले कमरे में बैठकर फाइलों के जरिए ही विकास की गंगा बहा रहे हैं।
व्यवस्था पर करारा तमाचा।
यह खबर उन अधिकारियों के गाल पर तमाचा है जो ऑफिस में बैठकर ‘ऑल इज वेल’ की रिपोर्ट भेजते हैं। रामचंद्रही गांव में हो रहा यह बंदरबांट चीख-चीख कर कह रहा है कि:
* फोटो फर्जी है।
* कार्यस्थल फर्जी है।
* हाजिरी फर्जी है।
* केवल सरकारी धन की लूट असली है।

रोजगार सेवक को ‘अतिरिक्त कार्यभार’ का कवच।
मजे की बात यह है कि रोजगार सेवक के बचाव में यह तर्क दिया जा रहा है कि उनके पास इतने गांवों का प्रभार है कि वह हर जगह जा नहीं सकते। ऐसे में फोटो कहीं भी खींचकर पोर्टल पर चढ़ा देना ही ‘स्मार्ट वर्क’ माना जा रहा है।

सरकार से सवाल।
क्या मुख्यमंत्री जी का भ्रष्टाचार मुक्त उत्तर प्रदेश का सपना इन “कुर्सी-तोड़” तकनीकी सहायकों और “फोटोशॉप” के उस्ताद रोजगार सेवकों के भरोसे पूरा होगा? क्या निचलौल ब्लॉक के जिम्मेदार अधिकारी इस डिजिटल डकैती पर संज्ञान लेंगे या फिर फाइलें इसी तरह ‘ठंडे बस्ते’ में धूल फांकती रहेंगी?

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