ज्योतिष शास्त्र की विशाल और जटिल गणनाओं के बीच ग्रहों के आपसी संबंधों को समझना फलादेश की नींव माना जाता है क्योंकि कोई भी ग्रह जब किसी कुंडली में अपना प्रभाव डालता है तो वह केवल अपनी स्थिति तक सीमित नहीं रहता बल्कि अपने साथियों और शत्रुओं के स्वभाव के अनुरूप अपना व्यवहार बदल लेता है. आज के समय में जब ज्योतिष को लेकर जिज्ञासा बढ़ रही है तब यह समझना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि एक ही ग्रह किसी व्यक्ति के लिए अत्यंत शुभ और दूसरे के लिए कष्टकारी क्यों हो जाता है और इसका उत्तर ग्रहों की नैसर्गिक मित्रता, शत्रुता और समता के गुप्त सिद्धांतों में छिपा है.
ज्योतिष विद्वानों के अनुसार ग्रहों के संबंधों को याद रखने का सबसे प्रमाणिक और सरल नियम मूलत्रिकोण राशि से गणना करना है जिसमें किसी भी ग्रह की मूलत्रिकोण राशि को आधार मानकर अन्य ग्रहों के साथ उसके संबंधों की व्याख्या की जाती है. इस पद्धति में सबसे पहले उस ग्रह की मूलत्रिकोण राशि को एक काल्पनिक लग्न के रूप में स्थापित किया जाता है और वहां से बारह भावों की गिनती की जाती है जिसमें एक विशिष्ट संख्यात्मक सूत्र का पालन होता है. इस नियम के अंतर्गत दूसरा, चौथा, पांचवां, आठवां, नौवां और बारहवां भाव मित्र भाव की श्रेणी में आते हैं जबकि पहला, तीसरा, छठा, सातवां, दसवां और ग्यारहवां भाव शत्रु भाव माने जाते हैं.
जब इन निर्धारित मित्र भावों में किसी अन्य ग्रह की राशियां आती हैं तो वह ग्रह उस मूल ग्रह का मित्र बन जाता है और यदि राशियां शत्रु भावों में पड़ती हैं तो वह शत्रु की श्रेणी में आता है, वहीं यदि किसी ग्रह की एक राशि मित्र भाव में और दूसरी शत्रु भाव में हो तो वह 'सम' यानी तटस्थ व्यवहार वाला माना जाता है. उदाहरण के तौर पर यदि हम देवगुरु बृहस्पति की मित्रता का विश्लेषण करें तो उनकी मूलत्रिकोण राशि धनु को केंद्र में रखकर गणना करने पर स्पष्ट होता है कि मंगल की राशियां मेष और वृश्चिक क्रमशः पांचवें और बारहवें भाव में आने के कारण उनके परम मित्र हैं, इसी प्रकार सूर्य और चंद्रमा भी मित्र भावों के स्वामी होने के कारण गुरु के सहयोगी बनते हैं. दूसरी ओर शुक्र और बुध की राशियां शत्रु भावों में आने के कारण वे गुरु के शत्रु माने जाते हैं जबकि शनि की एक राशि मित्र और दूसरी शत्रु भाव में होने से वे गुरु के लिए सम प्रभाव रखते हैं.
हालांकि ज्योतिषीय विश्लेषण केवल यहीं समाप्त नहीं होता क्योंकि किसी ग्रह का मित्र या शत्रु होना मात्र उसके व्यवहार का संकेत है, उसका वास्तविक परिणाम उसकी तात्कालिक स्थिति और बल पर निर्भर करता है. एक कुशल ज्योतिषी को मित्रता के साथ-साथ ग्रह की डिग्री, उसका उच्च या नीच होना, वक्री या मार्गी स्थिति, अस्त होना और विशेष रूप से वह किस नक्षत्र में विराजमान है, इन सभी पहलुओं का बारीकी से अध्ययन करना चाहिए. ग्रह की शक्ति का वास्तविक आकलन षडबल, भावबल और अष्टकवर्ग के माध्यम से ही संभव है, साथ ही नवांश जैसी वर्ग कुंडलियां ग्रह की आंतरिक मजबूती को प्रकट करती हैं.
अंततः किसी भी ग्रह का फल जातक को उसकी महादशा और अंतर्दशा के दौरान ही प्राप्त होता है, इसलिए गोचर के साथ दशा चक्र का मिलान करना सटीक भविष्यवाणी के लिए अनिवार्य है. इस प्रकार मूलत्रिकोण के सरल सूत्र को अपनाकर और अन्य ज्योतिषीय मापदंडों जैसे दृष्टि, युति और योग को सम्मिलित करके कोई भी जिज्ञासु अपनी कुंडली का गहरा और तार्किक विश्लेषण कर सकता है जिससे न केवल ज्योतिष की समझ स्पष्ट होती है बल्कि जीवन की भविष्यवाणियां भी अधिक प्रभावी और सत्य सिद्ध होती हैं.






























