चेन्नई. तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के गठबंधन को लेकर तस्वीर साफ होती नजर आ रही है. कांग्रेस पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह आगामी चुनावों में भी डीएमके के साथ गठबंधन बनाए रखेगी. दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत चल रही है और जल्द ही इस पर अंतिम निर्णय लिए जाने की संभावना जताई जा रही है. लंबे समय से चले आ रहे इस राजनीतिक रिश्ते को बनाए रखने की मंशा दोनों ही दलों की ओर से दिखाई दे रही है.
कांग्रेस और डीएमके का गठबंधन तमिलनाडु की राजनीति में दो दशकों से भी अधिक समय से प्रभावी रहा है. वर्ष 2004 के बाद से दोनों दल लगभग हर चुनाव में साथ लड़े हैं, केवल 2014 के लोकसभा चुनाव को छोड़कर, जब कांग्रेस ने अलग राह चुनी थी. हालांकि उसके बाद फिर दोनों दल एकजुट हुए और राज्य की राजनीति में साझा रणनीति के साथ आगे बढ़ते रहे. मौजूदा परिस्थितियों में भी कांग्रेस नेतृत्व यह मानता है कि तमिलनाडु में डीएमके के साथ गठबंधन ही पार्टी के लिए सबसे व्यावहारिक और मजबूत विकल्प है.
सूत्रों के अनुसार, सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस और डीएमके के शीर्ष नेताओं के बीच लगातार संवाद चल रहा है. कांग्रेस यह चाहती है कि उसे सम्मानजनक संख्या में सीटें मिलें, ताकि वह राज्य की राजनीति में अपनी उपस्थिति और प्रभाव को बनाए रख सके. वहीं डीएमके का फोकस गठबंधन को मजबूत बनाए रखते हुए चुनावी गणित को संतुलित करने पर है. दोनों दल इस बात से अवगत हैं कि गठबंधन में किसी भी तरह की खटास का सीधा फायदा विपक्षी दलों को मिल सकता है.
बीते विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो यह साफ होता है कि कांग्रेस को तमिलनाडु में मिलने वाली सीटों की संख्या समय के साथ घटती-बढ़ती रही है. जहां पहले कांग्रेस अपेक्षाकृत अधिक सीटों पर चुनाव लड़ती थी, वहीं हाल के वर्षों में उसकी हिस्सेदारी सीमित रही है. इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व यह मानता है कि डीएमके के साथ गठबंधन के जरिए वह सत्ता और नीति निर्धारण में अपनी भूमिका बनाए रख सकती है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि गठबंधन केवल सीटों का गणित नहीं, बल्कि साझा विचारधारा और सामाजिक न्याय के एजेंडे पर आधारित है.
डीएमके के लिए भी कांग्रेस का साथ राजनीतिक रूप से अहम माना जाता है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की मौजूदगी और केंद्र की राजनीति में उसकी भूमिका डीएमके के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है. ऐसे में दोनों दल एक-दूसरे की जरूरतों और मजबूरियों को समझते हुए समझौते की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. गठबंधन के नेताओं का कहना है कि बातचीत सकारात्मक माहौल में चल रही है और किसी भी तरह के टकराव की स्थिति नहीं है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन का जारी रहना लगभग तय है. भाजपा के बढ़ते प्रभाव और एआईएडीएमके की रणनीतियों को देखते हुए विपक्षी एकता को मजबूत रखना डीएमके की प्राथमिकता है. वहीं कांग्रेस भी राज्य में अकेले दम पर बड़ी राजनीतिक सफलता की स्थिति में नहीं है, ऐसे में गठबंधन ही उसके लिए सबसे सुरक्षित रास्ता है.
कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा हुई है. पार्टी के कुछ नेता जहां अधिक सीटों की मांग कर रहे हैं, वहीं शीर्ष नेतृत्व का रुख व्यावहारिक नजर आता है. नेतृत्व यह मानता है कि सीमित सीटों पर भी यदि पार्टी प्रभावी ढंग से चुनाव लड़ती है, तो उसका राजनीतिक लाभ सुनिश्चित किया जा सकता है. वहीं डीएमके यह सुनिश्चित करना चाहती है कि गठबंधन में संतुलन बना रहे और कोई भी घटक दल असंतुष्ट न हो.
आगामी चुनावों को लेकर तमिलनाडु में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो चुकी है. सभी प्रमुख दल अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटे हैं. ऐसे में कांग्रेस और डीएमके के बीच चल रही सीट शेयरिंग की बातचीत पर पूरे राज्य की राजनीतिक निगाहें टिकी हुई हैं. दोनों दलों के नेता सार्वजनिक रूप से यह संकेत दे चुके हैं कि गठबंधन को लेकर किसी तरह का संशय नहीं है और बातचीत अंतिम चरण में है.
कांग्रेस-डीएमके गठबंधन का इतिहास बताता है कि दोनों दलों ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन अंततः राजनीतिक समझदारी के तहत साथ बने रहे हैं. मौजूदा दौर में भी यही परंपरा जारी रहने के संकेत मिल रहे हैं. माना जा रहा है कि सीटों के बंटवारे को लेकर जल्द ही औपचारिक घोषणा की जा सकती है, जिससे चुनावी तैयारियों को गति मिलेगी.
कुल मिलाकर, तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेस और डीएमके का गठबंधन एक बार फिर मजबूती के साथ आगे बढ़ता दिख रहा है. सीटों को लेकर चल रही बातचीत भले ही जटिल हो, लेकिन दोनों दलों की साझा राजनीतिक जरूरतें और लंबे समय का रिश्ता यह संकेत देता है कि समझौता अवश्य होगा. आने वाले दिनों में इस गठबंधन की रूपरेखा स्पष्ट होते ही राज्य की चुनावी तस्वीर और अधिक साफ हो जाएगी.

































