कराकास/वॉशिंगटन। वेनेजुएला एक बार फिर वैश्विक राजनीति के सबसे बड़े संकट के केंद्र में आ खड़ा हुआ है। शनिवार तड़के अमेरिका द्वारा किए गए कथित बड़े सैन्य हमलों के बाद राजधानी कराकास सहित कई शहरों में विस्फोटों की खबरें सामने आईं, जिससे देश में राजनीतिक और सैन्य उथल-पुथल तेज हो गई। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को अमेरिकी सेना ने एक विशेष ऑपरेशन में हिरासत में ले लिया है और उन्हें देश से बाहर ले जाया गया है। हालांकि इस दावे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद और भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है।
वेनेजुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज ने अमेरिकी दावे को सिरे से खारिज करते हुए वॉशिंगटन से मादुरो के “जिंदा होने का सबूत” सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने कहा कि सरकार को राष्ट्रपति और उनकी पत्नी के ठिकाने की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। इसी बीच अमेरिका में रिपब्लिकन सीनेटर माइक ली ने दावा किया कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने उन्हें बताया है कि मादुरो को आपराधिक आरोपों के तहत अमेरिका में मुकदमे के लिए गिरफ्तार किया गया है। इन परस्पर विरोधी बयानों ने वेनेजुएला संकट को और गहरा कर दिया है।
इस राजनीतिक भूचाल के बीच दुनिया की नजर एक बार फिर उस व्यक्ति के जीवन पर टिक गई है, जिसने एक साधारण बस ड्राइवर से लेकर वेनेजुएला के सबसे शक्तिशाली पद तक का सफर तय किया। निकोलस मादुरो का जन्म 23 नवंबर 1962 को कराकास के पास लॉस चागुआरामोस इलाके में हुआ था। बेहद साधारण परिवार से आने वाले मादुरो ने कभी विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी नहीं की। हाई स्कूल के बाद उन्होंने काम करना शुरू किया और यहीं से ट्रेड यूनियन आंदोलन से उनका जुड़ाव हुआ।
कराकास में बस ड्राइवर के तौर पर काम करते हुए मादुरो ने परिवहन कर्मचारियों की एक अनौपचारिक यूनियन बनाई, जिसने उन्हें एक तेजतर्रार वक्ता और कुशल संगठनकर्ता के रूप में पहचान दिलाई। यही पहचान आगे चलकर उनकी राजनीतिक सीढ़ी बनी। युवावस्था में वे क्यूबा गए, जहां उन्होंने राजनीतिक प्रशिक्षण लिया और वामपंथी विचारधारा से गहराई से जुड़े। इसी दौर में उनका संपर्क वेनेजुएला के करिश्माई नेता ह्यूगो चावेज से हुआ, जो आगे चलकर उनके राजनीतिक गुरु और मार्गदर्शक बने।
ह्यूगो चावेज के शासनकाल में मादुरो तेजी से सत्ता के केंद्र में पहुंचे। पहले विदेश मंत्री, फिर नेशनल असेंबली के अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति जैसे अहम पदों पर रहते हुए उन्होंने खुद को चावेज का सबसे भरोसेमंद सहयोगी साबित किया। 2013 में चावेज के निधन के बाद मादुरो वेनेजुएला के राष्ट्रपति बने और तभी से देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उनका दबदबा बना रहा।
मादुरो का शासन हमेशा विवादों में रहा है। सत्ता संभालने के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने “वाइस मिनिस्ट्री ऑफ सुप्रीम हैप्पीनेस” नाम का एक अनोखा विभाग बनाया, जिसका उद्देश्य सामाजिक योजनाओं का समन्वय बताया गया। इसके अलावा उनके कई बयान और दावे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बने। उन्होंने एक बार कहा था कि ह्यूगो चावेज उनकी आत्मा से एक छोटी चिड़िया के रूप में मिलने आए और उन्हें आशीर्वाद दिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि वे चावेज की समाधि के पास जाकर सोते हैं, ताकि उनसे आध्यात्मिक मार्गदर्शन मिल सके।
इन सबके बीच मादुरो की आध्यात्मिक आस्था ने उन्हें वैश्विक स्तर पर अलग पहचान दी। वे भारतीय आध्यात्मिक गुरु सत्य साईं बाबा के बड़े भक्त रहे हैं और शाकाहारी जीवनशैली अपनाने के लिए भी जाने जाते हैं। राष्ट्रपति बनने से पहले, वर्ष 2005 में विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने अपनी पत्नी सिलिया फ्लोरेस के साथ भारत के पुट्टपर्थी स्थित प्रशांति निलयम आश्रम का दौरा किया था। वहां सत्य साईं बाबा से उनकी निजी मुलाकात हुई थी। इस यात्रा की तस्वीरें आज भी चर्चा में रहती हैं, जिनमें मादुरो पारंपरिक भारतीय अंदाज में जमीन पर बैठकर प्रवचन सुनते नजर आते हैं।
मिराफ्लोरेस पैलेस में उनके निजी दफ्तर की दीवारों पर जहां एक ओर साइमन बोलिवर और ह्यूगो चावेज की तस्वीरें लगी रहती थीं, वहीं सत्य साईं बाबा की बड़ी तस्वीर को भी विशेष स्थान दिया गया था। सत्य साईं बाबा के निधन पर 2011 में वेनेजुएला ने राष्ट्रीय शोक घोषित किया, जो लैटिन अमेरिका में एक अभूतपूर्व कदम माना गया। उस समय मादुरो विदेश मंत्री थे और उनके प्रभाव में संसद ने भारतीय गुरु के योगदान को औपचारिक रूप से सम्मानित किया।
मादुरो के संरक्षण में वेनेजुएला में सत्य साईं संगठन का विस्तार हुआ। कई अन्य विदेशी गैर-सरकारी संगठनों को जहां देश से बाहर कर दिया गया, वहीं साईं संगठन को स्कूल और मानव मूल्य संस्थान चलाने की अनुमति दी गई। आलोचकों का कहना है कि इस आध्यात्मिक आंदोलन को सरकार ने अपनी “सॉफ्ट पावर” रणनीति के तहत इस्तेमाल किया।
इसके बावजूद मादुरो की छवि एक तानाशाह शासक की बनी रही। उनके कार्यकाल में वेनेजुएला गंभीर आर्थिक संकट से गुजरा। हाइपरइन्फ्लेशन, भोजन और दवाओं की भारी कमी, बेरोजगारी और तेल आधारित अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन ने देश को तबाही के कगार पर पहुंचा दिया। लाखों वेनेजुएलावासी बेहतर जीवन की तलाश में देश छोड़ने को मजबूर हुए। विपक्षी प्रदर्शनों को सेना और सुरक्षा बलों के जरिए कुचलने, चुनावों में धांधली और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगातार लगते रहे।
मादुरो पर यह भी आरोप है कि उन्होंने संसद की भूमिका को कमजोर कर डिक्री के जरिए शासन किया और असहमति की आवाजों को दबाया। अंतरराष्ट्रीय मंच पर वे अमेरिका-विरोधी खेमे के नेताओं के करीब माने जाते रहे, जिनमें गद्दाफी, मुगाबे और अहमदीनेजाद जैसे नाम शामिल हैं।
आज जब अमेरिका के हमलों और मादुरो की कथित गिरफ्तारी को लेकर विरोधाभासी दावे सामने आ रहे हैं, तब वेनेजुएला का भविष्य एक बार फिर अनिश्चितता के घेरे में है। एक बस ड्राइवर से राष्ट्रपति बने निकोलस मादुरो की कहानी अब केवल सत्ता और संघर्ष की नहीं, बल्कि आस्था, विवाद और वैश्विक राजनीति के टकराव की भी कहानी बन चुकी है। दुनिया इस बात का इंतजार कर रही है कि इस संकट का अगला अध्याय क्या मोड़ लेगा।

































