नई दिल्ली. दुनिया इस समय रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और तेजी से बदलते जलवायु हालात का सामना कर रही है. चरम मौसम की घटनाएं, बढ़ता समुद्री स्तर और लगातार बढ़ता वैश्विक तापमान यह संकेत दे रहे हैं कि जलवायु संकट अब भविष्य की नहीं बल्कि वर्तमान की चुनौती बन चुका है. इसी बीच एक अहम सवाल वैश्विक स्तर पर चर्चा में है कि क्या देश भविष्य की तकनीकों के भरोसे आज की उत्सर्जन कटौती को टाल सकते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए अध्ययन ने इस सोच को बेहद खतरनाक बताते हुए स्पष्ट चेतावनी जारी की है. अध्ययन के अनुसार यदि देश वर्तमान में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के बजाय भविष्य में कार्बन हटाने वाली तकनीकों पर अत्यधिक निर्भरता दिखाते हैं, तो यह न केवल जलवायु लक्ष्यों को कमजोर करेगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में भी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है.
यह अध्ययन कार्बन डाइऑक्साइड रिमूवल यानी सीडीआर तकनीकों की भूमिका पर केंद्रित है. इन तकनीकों का उद्देश्य वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को निकालकर उसे सुरक्षित रूप से स्टोर करना होता है. शोधकर्ताओं ने माना है कि कार्बन हटाने की तकनीकें जलवायु परिवर्तन से निपटने की व्यापक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती हैं, लेकिन इन्हें उत्सर्जन कम करने के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करना बेहद जोखिम भरा साबित हो सकता है. अध्ययन में कहा गया है कि यदि देश अपनी जलवायु नीतियों में भविष्य की इन तकनीकों पर अत्यधिक भरोसा करते हैं और वर्तमान में उत्सर्जन घटाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाते हैं, तो पेरिस समझौते के तहत तय 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान सीमा को बनाए रखना लगभग असंभव हो सकता है.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई देश अपनी नेट जीरो योजनाओं में बड़े पैमाने पर कार्बन हटाने की तकनीकों को शामिल कर रहे हैं. हालांकि इन तकनीकों की व्यवहारिकता, लागत, सामाजिक स्वीकार्यता और समयसीमा को लेकर अभी भी गंभीर अनिश्चितताएं बनी हुई हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन तकनीकों पर अत्यधिक भरोसा किया गया तो यह वैश्विक तापमान में लंबे समय तक बढ़ोतरी का कारण बन सकता है. इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘ओवरशूट’ कहा जाता है, यानी वह स्थिति जब धरती का तापमान तय सुरक्षित सीमा से ऊपर चला जाता है और बाद में उसे नियंत्रित करना बेहद मुश्किल हो जाता है. ऐसे हालात में पारिस्थितिकी तंत्र, समुद्री जीवन, कृषि और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं.
ऑक्सफोर्ड लॉ फैकल्टी की प्रोफेसर लवण्या राजामणि, जो इस अध्ययन की प्रमुख लेखकों में शामिल हैं, ने कहा है कि कुछ देश भविष्य की अनिश्चित तकनीकों पर दांव लगाकर जलवायु कार्रवाई को टालने की कोशिश कर रहे हैं. उनके अनुसार यह दृष्टिकोण गंभीर, व्यापक और अपूरणीय जलवायु क्षति का कारण बन सकता है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि निकट भविष्य में उत्सर्जन में तेज और ठोस कटौती करना केवल नैतिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्व भी है. यदि देश समय रहते उत्सर्जन कम नहीं करते हैं तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेही का सामना करना पड़ सकता है.
अध्ययन में वर्ष 2025 में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस द्वारा जलवायु परिवर्तन पर दी गई सलाहकारी राय का भी उल्लेख किया गया है. इस राय में ‘हानि रोकथाम’ और ‘ड्यू डिलिजेंस’ जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों को विस्तार से समझाया गया था. इन सिद्धांतों के अनुसार देशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी जलवायु नीतियां और रणनीतियां दूसरे देशों या वैश्विक पर्यावरण को गंभीर नुकसान न पहुंचाएं. साथ ही देशों को जोखिमों को लेकर सतर्क और जिम्मेदार रवैया अपनाना होगा. यदि कोई देश भविष्य की तकनीकों पर अत्यधिक निर्भरता दिखाकर उत्सर्जन कम करने में देरी करता है, तो यह इन सिद्धांतों के उल्लंघन के रूप में देखा जा सकता है.
अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अंतरराष्ट्रीय कानून पहले से ही जलवायु रणनीतियों के लिए कुछ महत्वपूर्ण दिशानिर्देश तय करता है. इनमें सबसे प्रमुख यह है कि देशों को सबसे पहले उत्सर्जन घटाने को प्राथमिकता देनी होगी. इसके अलावा किसी भी कार्बन हटाने की योजना का तकनीकी रूप से व्यवहार्य और सामाजिक रूप से स्वीकार्य होना जरूरी है. साथ ही यह भी जांचना आवश्यक होगा कि इन तकनीकों के उपयोग से पर्यावरण या समाज पर किसी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव तो नहीं पड़ रहा है. रिपोर्ट में यह चिंता भी जताई गई है कि कई देश विदेशों में किए जा रहे कार्बन हटाने के प्रयासों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो सकते हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर असमानता और जवाबदेही से जुड़े नए सवाल खड़े हो सकते हैं.
प्रक्रियात्मक पारदर्शिता को भी अध्ययन में बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है. शोधकर्ताओं के अनुसार देशों को यह स्पष्ट रूप से बताना होगा कि वे किस प्रकार की कार्बन हटाने की तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं, उनके भविष्य के अनुमान किन मान्यताओं पर आधारित हैं और उत्सर्जन तथा कार्बन हटाने की प्रक्रिया को अलग-अलग कैसे मापा जा रहा है. पारदर्शिता की कमी से जलवायु लक्ष्यों की वास्तविक प्रगति का आकलन करना मुश्किल हो सकता है और इससे वैश्विक विश्वास पर भी असर पड़ सकता है.
अध्ययन के सह लेखक डॉ. रूपर्ट स्टुअर्ट स्मिथ ने कहा कि वर्तमान में लिए जा रहे फैसलों का प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा. इसलिए यह बेहद जरूरी है कि जलवायु नीतियों में कानूनी सीमाएं और स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए जाएं. उन्होंने कहा कि कार्बन हटाने की योजनाएं उत्सर्जन में तत्काल और गहरी कटौती का विकल्प नहीं बन सकतीं. यदि देश आज उत्सर्जन कम करने के प्रयासों को टालते हैं, तो भविष्य में कार्बन हटाने की तकनीकों के जरिए जलवायु संकट को नियंत्रित करना बेहद कठिन हो सकता है.
यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल क्लाइमेट पॉलिसी में प्रकाशित हुआ है और इसमें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के साथ इम्पीरियल कॉलेज लंदन, जर्मनी और ऑस्ट्रिया के प्रमुख शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों ने भाग लिया है. शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के माध्यम से स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है कि जलवायु संकट से निपटने के लिए संतुलित और जिम्मेदार रणनीति अपनाना जरूरी है. कार्बन हटाने की तकनीकों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि वर्तमान की उत्सर्जन कटौती को नजरअंदाज कर केवल भविष्य की संभावनाओं पर भरोसा किया गया, तो यह वैश्विक जलवायु सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्व दोनों के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तत्काल कार्रवाई, मजबूत नीतियां और वैश्विक सहयोग ही सबसे प्रभावी रास्ता है. यदि देश समय रहते उत्सर्जन कम करने के लिए ठोस कदम उठाते हैं और साथ ही नई तकनीकों का संतुलित उपयोग करते हैं, तभी पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है. यह अध्ययन विश्व समुदाय को चेतावनी देता है कि जलवायु संकट को भविष्य पर टालना संभव नहीं है और आज उठाए गए कदम ही पृथ्वी के सुरक्षित भविष्य की नींव तय करेंगे.





























