वॉशिंगटन.
एलन मस्क के स्वामित्व वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स से जुड़े आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल ‘ग्रोक’ को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखा विरोध सामने आया है। हाल ही में ग्रोक में जोड़े गए ‘एडिट इमेज’ फीचर के बाद यह विवाद गहराता चला गया, जब बड़ी संख्या में उपयोगकर्ताओं ने महिलाओं और नाबालिगों की तस्वीरों को यौनिक रूप से परिवर्तित करने के आरोप लगाए। “कपड़े उतारो”, “बिकिनी पहनाओ” जैसे संकेतों पर एआई द्वारा आपत्तिजनक और अश्लील डीपफेक तस्वीरें तैयार किए जाने की शिकायतों ने तकनीक, नैतिकता और कानून के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
सोमवार को यह मामला उस समय और गंभीर हो गया, जब यूरोपीय संघ ने औपचारिक रूप से चिंता व्यक्त करते हुए ग्रोक के खिलाफ संभावित नियामकीय कार्रवाई के संकेत दिए। ब्रिटेन की ओर से भी जांच की चेतावनी दी गई, जबकि अमेरिका में डिजिटल अधिकार संगठनों और बाल संरक्षण से जुड़े समूहों ने इस फीचर को “खतरनाक, गैर-जिम्मेदाराना और सामाजिक रूप से विनाशकारी” करार दिया। वॉशिंगटन में नीति-निर्माताओं और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच यह सवाल प्रमुख हो गया है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को इतनी खुली छूट दी जा सकती है, जब उसका सीधा असर महिलाओं की गरिमा और बच्चों की सुरक्षा पर पड़ रहा हो।
ग्रोक को एलन मस्क की कंपनी xAI ने एक अपेक्षाकृत ‘कम सेंसरशिप’ वाले एआई के रूप में पेश किया था, जो उपयोगकर्ताओं को अधिक स्वतंत्रता देता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यही स्वतंत्रता अब गंभीर दुरुपयोग का कारण बन रही है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर हजारों उपयोगकर्ताओं ने स्क्रीनशॉट साझा कर यह दावा किया कि ग्रोक से किसी भी सार्वजनिक तस्वीर को यौनिक रूप से बदलवाना बेहद आसान हो गया है। इनमें से कई मामलों में नाबालिगों की तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ किए जाने के आरोप भी सामने आए, जिसने विवाद को और भड़का दिया।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस तरह की तकनीक महिलाओं और बच्चों के खिलाफ डिजिटल हिंसा को बढ़ावा देती है। वॉशिंगटन स्थित एक डिजिटल अधिकार संस्था के अनुसार, डीपफेक तकनीक पहले ही महिलाओं के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी है, जहां उनकी बिना अनुमति अश्लील तस्वीरें और वीडियो तैयार कर उन्हें मानसिक, सामाजिक और पेशेवर नुकसान पहुंचाया जाता है। अब एआई टूल्स के जरिए यह प्रक्रिया और भी आसान हो जाना चिंता का विषय है।
यूरोपीय संघ ने इस मामले को अपने प्रस्तावित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कानून के संदर्भ में देखा है। यूरोपीय आयोग के अधिकारियों ने संकेत दिया है कि यदि ग्रोक जैसे टूल्स ने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को खतरे में डाला, तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है। ब्रिटेन में भी डेटा संरक्षण और ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े नियामक इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या ग्रोक का ‘एडिट इमेज’ फीचर वहां के कानूनों का उल्लंघन करता है।
एलन मस्क और उनकी कंपनी की ओर से इस विवाद पर अब तक कोई विस्तृत सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन एक्स से जुड़े कुछ अधिकारियों ने अनौपचारिक रूप से कहा है कि शिकायतों की समीक्षा की जा रही है। आलोचकों का कहना है कि केवल समीक्षा पर्याप्त नहीं है और जब तक इस फीचर पर सख्त सीमाएं नहीं लगाई जातीं, तब तक नुकसान जारी रहेगा।
अमेरिका में यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या मौजूदा कानून एआई से पैदा होने वाले ऐसे खतरों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। फिलहाल अमेरिकी कानूनों में डीपफेक से संबंधित नियम राज्य स्तर पर अलग-अलग हैं और संघीय स्तर पर स्पष्ट ढांचा अभी विकसित हो रहा है। वॉशिंगटन में कुछ सांसदों ने मांग की है कि एआई कंपनियों पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर सख्त जिम्मेदारी तय की जाए और उल्लंघन की स्थिति में भारी जुर्माने का प्रावधान हो।
तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल ग्रोक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे एआई इकोसिस्टम की है। जैसे-जैसे इमेज एडिटिंग और जनरेटिव एआई अधिक उन्नत हो रहे हैं, उनके दुरुपयोग की संभावना भी बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, बिना मजबूत कंटेंट मॉडरेशन और नैतिक दिशानिर्देशों के ऐसे टूल्स समाज में गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इस विवाद ने एक बार फिर एलन मस्क की “अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता” वाली सोच को सवालों के घेरे में ला दिया है। आलोचकों का तर्क है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरों की गरिमा व सुरक्षा के बीच संतुलन आवश्यक है। खासकर तब, जब तकनीक इतनी शक्तिशाली हो कि वह किसी की छवि और पहचान को पल भर में विकृत कर दे।
महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने वॉशिंगटन में प्रदर्शन कर मांग की है कि ग्रोक के विवादित फीचर को तुरंत निलंबित किया जाए। उनका कहना है कि डिजिटल दुनिया में भी वही नैतिक और कानूनी मानक लागू होने चाहिए, जो वास्तविक दुनिया में माने जाते हैं। नाबालिगों से जुड़ी किसी भी तरह की यौनिक सामग्री को “शून्य सहिष्णुता” के सिद्धांत पर देखा जाना चाहिए।
ग्रोक विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल तकनीकी विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक, कानूनी और नैतिक मुद्दा बन चुका है। वॉशिंगटन से लेकर ब्रसेल्स और लंदन तक, नीति-निर्माता इस बात पर विचार करने को मजबूर हैं कि एआई की तेजी से बढ़ती क्षमताओं को कैसे नियंत्रित किया जाए, ताकि नवाचार और मानव गरिमा के बीच संतुलन बना रहे। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि एलन मस्क और उनकी कंपनियां इस वैश्विक दबाव का कैसे जवाब देती हैं और क्या ग्रोक जैसे टूल्स पर ठोस नियंत्रण स्थापित किए जाते हैं या नहीं।

































