'मानवीय अंतर्द्वंद्व' पर जयप्रकाश मानस का चिंतन: 'पत्थरों की पंचायत'

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लेखक-परिचय:जयप्रकाश मानस, जिनका जन्म 2 अक्टूबर, 1965 को तत्कालीन मध्यप्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) के रायगढ़ शहर में हुआ, एक ऐसे साहित्यकार हैं जिनकी कलम जीवन के सूक्ष्म अनुभवों और गहन दार्शनिक विचारों को सरल शब्दों में पिरोती है. मातृभाषा उड़िया होने के बावजूद, उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है. एम.ए (भाषा विज्ञान) और एमएससी (आईटी) जैसी विविध शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें मानवीय मनोविज्ञान और आधुनिक तकनीकी पहलुओं को एक साथ समझने की अनूठी क्षमता प्रदान करती है. उनकी रचनाएँ अक्सर हमें अपने भीतर झाँकने और जीवन के गहरे अर्थों को समझने के लिए प्रेरित करती हैं. उनके लघु कथा संग्रह 'बची हुई हवा' में भी इसी तरह के चिंतन और मानवीय संवेदनाओं का संगम देखने को मिलता है.

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आज की लघुकथा: 'पत्थरों की पंचायत'

पर्वत की छाया में बसा था वह विचित्र गाँव जहाँ चट्टानें, पत्थर, गिट्टियाँ और कंकड़ साथ रहते पर अलग-अलग खड़े रहते. बड़ी चट्टानें ऊँची नाक उठाए रहतीं, गोल पत्थर अपनी चिकनाई पर इतराते, नुकीली गिट्टियाँ छोटे कंकड़ों को हेय दृष्टि से देखतीं.

एक भीषण वर्षा में उफनती नदी ने सबका अहंकार धो डाला. विशाल चट्टानें टूटकर खंडों में बिखर गईं, गोल पत्थर लुढ़ककर दूर जा पहुँचे, गिट्टियाँ-कंकड़ तो बहते ही चले गए. जलस्तर घटा तो एक चमत्कार हुआ:

  • टूटी चट्टानों ने मिलकर नदी पर पुल बनाया

  • बहकर आए पत्थरों ने घाट की सीढ़ियां गढ़ीं

  • गिट्टियाँ कंकड़ों के साथ मिलकर पगडंडी बनीं

  • छोटे कंकड़ बच्चों की गोली-डंडा खेल की मोहरें बने

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अब वे सब: पुल पर चलने वाले को चट्टानें सहेजतीं, पगडंडी पर गिट्टियाँ मजबूती देतीं, घाट की सीढ़ियों पर पत्थर थकान उतारते, और कंकड़ों की खनखनाहट में गाँव की हँसी गूँजती. उस दिन उन्होंने जाना – असली जाति तो कर्म होती है. पानी ने उन्हें बहाया नहीं, बल्कि जोड़कर नया अर्थ दिया. अब वे अलग थे पर अभिन्न भी, जैसे पंचायत के सदस्य – भिन्न पर विचार, पर एक ही प्रयोजन.

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कल के लिए प्रतीक्षा करें!

कल हम जयप्रकाश मानस जी की एक और विचारोत्तेजक लघुकथा 'प्रचलन से हटकर' के साथ उपस्थित होंगे, जो हमें लीक से हटकर सोचने की प्रेरणा देगी.

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