साहित्यिक लघु कथा धारावाहिक: 'प्रचलन से हटकर'

3
Advertisement

समाज की लीक और अपनी पगडंडी

कलम के जादूगर: जब हम जयप्रकाश मानस को पढ़ते हैं, तो हम केवल एक कहानी नहीं पढ़ते, बल्कि हम उस सच से रूबरू होते हैं जिसे हम अक्सर भीड़ के शोर में अनसुना कर देते हैं। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ की मिट्टी में रचे-बसे मानस जी की मातृभाषा भले ही ओड़िया हो, पर उनकी लेखनी जिस हिंदी का सृजन करती है, वह किसी भी भाषा-साहित्य के लिए गौरव की बात है। भाषा विज्ञान और तकनीक (IT) के ज्ञाता होने के नाते उनकी कहानियों में एक तरफ तार्किक गहराई होती है, तो दूसरी तरफ मानवीय संवेदनाओं का समंदर। 'बची हुई हवा' संग्रह की उनकी कहानियाँ हमें सिखाती हैं कि अस्तित्व की सार्थकता 'भीड़' का हिस्सा बनने में नहीं, बल्कि 'स्वयं' को खोजने में है।

यहां भी पढ़े:  MP युवा कांग्रेस के विधानसभा अध्यक्ष को पुलिस ने घर से उठाया, जानिए वजह

आज की लघुकथा: 'प्रचलन से हटकर'

वह हमेशा से अलग था। गाँव के दो हिस्से थे: एक तरफ़ वे, जो ख़ाली पेट मालिक के आँगन में झुक जाते थे; दूसरी तरफ़ वे, जिनका भरा पेट उन्हें मालिक बना देता था।

लेकिन वह…

उसने न तो झुकना सीखा, न ही मालिक बनने की लालसा पाली। उसने तीसरा रास्ता चुना—अपनी ज़मीन पर खड़े होकर अपनी रोटी उगाने का। एक दिन, जब गाँव वालों ने देखा कि वह अपने खेतों से उगाई गेहूँ की रोटी खा रहा है, तो वे हैरान रह गए।

यहां भी पढ़े:  सफर से पहले जानें कितना आएगा खर्च! आज शनिवार को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में आया बदलाव? चेक करें लेटेस्ट रेट

"यह तो प्रचलन से हटकर है!" – किसी ने कहा। "यह असंभव है!" – दूसरे ने हँसते हुए कहा।

लेकिन वह मुस्कुराया। उसकी कहानी न तो भूख की थी, न ताक़त की। वह सिर्फ़ इन्सान होने की कहानी थी।

कल का संकेत:

कल की कहानी 'सूर्य की बात' हमें उस ब्रह्मांडीय संवाद की ओर ले जाएगी, जहां सूरज स्वयं मनुष्य के लालच पर सवाल उठा रहा है। क्या हम प्रकृति के दिए उजाले के लायक बचे हैं? कल पढ़िए…

यहां भी पढ़े:  सोना धारण करने से होता है गुरु मजबूत
Advertisement