इंसानी लालच की हदें और कुदरत का मौन विलाप
कलम के जादूगर: जयप्रकाश मानस की कहानियाँ केवल कागज़ पर उकेरे गए शब्द नहीं, बल्कि हमारे समाज के चेहरे पर लगा एक आईना हैं। रायगढ़ की माटी से उपजा यह रचनाकार जब अपनी ओड़िया संवेदनाओं को हिंदी के तार्किक शिल्प में ढालता है, तो पाठक निशब्द रह जाता है। भाषा विज्ञान के सूक्ष्म ज्ञान और सूचना तकनीक की तार्किकता ने उनकी लेखनी को वह धार दी है, जो सीधे आत्मा को भेदती है। 'बची हुई हवा' का यह पड़ाव हमें उस सूरज के सामने खड़ा करता है, जो सदियों से हमें रोशनी दे रहा है, लेकिन आज वह खुद मनुष्य की नियति देखकर हताश है।
आज की लघुकथा: 'सूर्य की बात'
सूरज अपनी माँ, आकाशगंगा, से अनंत काल बाद मिल रहा था। उसकी किरणें आज कुछ मद्धम थीं, मानो युगों की थकान उनमें समा गई हो। माँ ने अपने विशाल, तारों भरे आलिंगन में उसे समेटते हुए पूछा, "बेटा, दुनिया कैसे लगी? अंधेर ठीक से छँट रहा है न?"
सूरज ने एक गहरी साँस ली, जैसे सारी सृष्टि का बोझ उसकी किरणों पर लदा हो। "माँ, क्या बताऊँ… मैं हार गया। असंख्य युगों से मैंने सबके घर एक समान रोशनी बाँटी। हर प्राणी, हर पौधे, हर नदी को बराबर उजाला दिया। न कोई भेद, न कोई पक्षपात। लेकिन आज भी…" उसकी आवाज़ में एक अनकही पीड़ा थी, जो माँ ने तुरंत भाँप ली।
"लेकिन क्या, बेटा?" माँ की आवाज़ में पहली बार निराशा की छाया झलकी। आकाशगंगा के तारे थम-से गए, मानो सूरज की बात सुनने को आतुर हों। "माँ, धरती पर इंसान ने सब कुछ बदल दिया है। वो कहता है कि मेरी रोशनी उसकी है, हवा उसकी है, पानी उसका है। उसने धरती को टुकड़ों में बाँट लिया, और हर टुकड़े पर अपना नाम लिख दिया। लेकिन माँ, क्या कोई मेरी किरणों पर दावा कर सकता है? क्या कोई हवा को बाँध सकता है? मैंने तो सबको बराबर बाँटा, फिर भी कुछ लोग सारी धरती को अपने कब्जे में लेना चाहते हैं।"
माँ चुप थी। उसकी चुप्पी में सृष्टि की सारी कहानियां गूँज रही थीं। सूरज ने आगे कहा, "माँ, दुनिया के अमीरों ने सबका जीना मुश्किल कर दिया। कुछ लोग मेरी रोशनी को विशाल काँच के महलों में क़ैद कर लेते हैं, जबकि लाखों लोग झुग्गियों में अँधेरे में जीते हैं। नदियों को बाँधकर वो पानी को बेचते हैं, जंगलों को काटकर वो हवा को जहरीला करते हैं। मेरी रोशनी, जो मैंने सबके लिए बनाई थी, अब उनके लिए सिर्फ़ सोना उगलने का ज़रिया बन गई है।"
आकाशगंगा की आँखों में एक तारा टिमटिमाया, मानो आँसू बनकर गिरने को तैयार हो। "बेटा, क्या वो नहीं समझते कि ये सब उनका नहीं, सबका है?"
"समझते हैं, मां," सूरज ने कहा, "लेकिन लालच उनकी आँखों पर पर्दा डाल देता है। मैं हर सुबह उगता हूँ, हर शाम ढलता हूँ, और हर बार सोचता हूँ कि शायद आज वो बदल जाएँ। शायद आज वो मेरी रोशनी को बाँट लें, नदियों को आज़ाद कर दें, हवा को साफ़ रखें। लेकिन हर बार मेरा दिल टूटता है।"
माँ ने गहरी साँस ली। "बेटा, तू हार मत मान। तू सूरज है। तेरी रोशनी में वो ताकत है जो अँधेरे को चीर सकती है। शायद एक दिन वो समझ जाएँ कि धरती उनकी नहीं, वो धरती के हैं।"
सूरज ने हल्के से मुस्कुराया। "माँ, मैं कोशिश करूँगा। लेकिन अगर वो नहीं बदले, तो तो शायद एक दिन मैं भी थक जाऊँगा।"
आकाशगंगा ने उसे अपने आलिंगन में और कस लिया। "तू थकेगा नहीं, बेटा। तू सूरज है। और सूरज कभी नहीं थकता।" सूरज चुप रहा। लेकिन अगली सुबह, जब वो फिर उगा, उसकी किरणों में एक नई चमक थी। शायद ये चमक किसी के दिल को छू ले। शायद ये चमक एक नई शुरुआत हो।
कल का संकेत:
कल का अंतिम पड़ाव 'खिलौना और बच्चा' कहानी के साथ होगा, जहाँ युद्ध की विभीषिका के बीच एक मासूम की रूह का दर्द हमें झकझोर देगा। क्या खिलौने सिर्फ़ प्लास्टिक के होते हैं? कल पढ़िए…






























