जन्म के सूतक का गहरा महत्व, जीवन के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर शास्त्रोक्त नियमों का पालन क्यों है अनिवार्य

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भारतीय सनातन संस्कृति और हिंदू धर्मशास्त्रों में जीवन के हर पड़ाव के लिए विशेष नियम और मर्यादाएं निर्धारित की गई हैं जिनमें जन्म के पश्चात लगने वाला 'सूतक' एक अत्यंत महत्वपूर्ण काल माना जाता है। वर्ष 2026 में भी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का निर्वहन करने वाले परिवारों के लिए इन नियमों की प्रासंगिकता वैसी ही बनी हुई है जैसी सदियों पहले थी क्योंकि यह केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि इसके पीछे गहरे मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक कारण छिपे हैं। पत्रकारिता के शास्त्रीय विश्लेषण के अनुसार सूतक का अर्थ उस अशुद्धि काल से है जो परिवार में नए शिशु के आगमन पर लागू होता है और इस दौरान गृहस्थों के लिए कठोर शास्त्रोक्त नियमों का पालन करना अनिवार्य बताया गया है। धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो सूतक के दौरान घर के मंदिर की मूर्तियों को स्पर्श करना पूरी तरह वर्जित होता है और धूप-दीप या किसी भी प्रकार का कर्मकांड जैसे हवन और अभिषेक नहीं किया जाता है। हालांकि भक्ति मार्ग के अनुयायियों के लिए मानसिक जप की छूट दी गई है लेकिन इस दौरान तुलसी की माला या किसी अन्य माला का उपयोग करने से बचने का निर्देश दिया गया है। यदि घर में पहले से कोई अखंड जोत प्रज्वलित है तो परिवार का कोई सदस्य उसे स्पर्श नहीं करता बल्कि पड़ोसी या किसी बाहरी व्यक्ति से घी या तेल डलवाकर उसकी निरंतरता बनाए रखी जाती है क्योंकि सूतक की अवधि पूरी होने तक मंदिर प्रवेश या किसी भी सार्वजनिक धार्मिक उत्सव में भाग लेना वर्जित माना गया है।

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खान-पान और रसोई से जुड़े नियमों की बात करें तो सूतक वाले घर का भोजन बाहरी लोगों या ब्राह्मणों को ग्रहण नहीं करना चाहिए और वैज्ञानिक दृष्टि से इसे संक्रमण से बचने का एक प्रभावी तरीका माना जाता है। इस काल में जच्चा और बच्चा को एक निश्चित मर्यादित कक्ष में रखा जाता है ताकि उन्हें बाहरी कीटाणुओं और अशुद्ध वातावरण से बचाया जा सके और इसी कारण प्रसूता को रसोई के कार्यों से दूर रखकर पूर्ण विश्राम दिया जाता है। सामाजिक स्तर पर भी सूतक के दौरान सगाई, विवाह, गृह-प्रवेश या किसी भी नए व्यापारिक कार्य की शुरुआत नहीं की जाती और न ही इस अवधि में दान देने या लेने की परंपरा है। आमतौर पर गृहस्थों के लिए यह अवधि 10 दिनों की मुख्य मानी गई है जिसके बाद 10वें दिन घर की गहन साफ-सफाई, गंगाजल का छिड़काव और पवित्र स्नान के बाद ही पूजा-पाठ पुनः शुरू करने का विधान है। कई परिवारों में 11वें या 12वें दिन 'नामकरण' संस्कार के साथ एक छोटा हवन आयोजित कर घर की पूर्ण शुद्धि की जाती है जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

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शास्त्रों में कुछ विशेष परिस्थितियों का भी वर्णन मिलता है जैसे यदि यात्रा के दौरान या अस्पताल में जन्म हुआ हो तो सूतक के प्रारंभ होने का समय क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार घर प्रवेश से माना जाता है। इसी प्रकार यदि सूतक की अवधि के बीच कोई बड़ा त्योहार जैसे दीपावली या होली आ जाए तो उसे केवल मानसिक रूप से ही मनाया जाता है और दीप प्रज्वलन जैसी क्रियाएं वर्जित रहती हैं। रोचक तथ्य यह भी है कि गौ सूतक की भी मान्यता है जिसमें यदि घर की गाय बछड़े को जन्म दे तो 15 दिनों तक दूध के संदर्भ में विशेष नियम लागू होते हैं। अंततः सूतक का मूल उद्देश्य नवजात शिशु और माता के स्वास्थ्य की रक्षा करना और उन्हें बाहरी संक्रमण से सुरक्षित रखना है। ज्योतिषीय और पारिवारिक परामर्श के अनुसार 2026 में भी इन नियमों के पालन से पहले अपने कुल पुरोहित से चर्चा करना श्रेयस्कर रहता है क्योंकि कुल-परंपराओं के अनुसार इनमें सूक्ष्म बदलाव संभव हैं। यह प्राचीन पद्धति आज के आधुनिक युग में भी क्वारंटाइन और हाइजीन के सिद्धांतों का एक जीवंत उदाहरण पेश करती है जिसे सनातन धर्म ने युगों पहले आत्मसात कर लिया था।

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