साहित्यिक धारावाहिक: टूटे खिलौने, बिखरा बचपन: युद्ध की सबसे क्रूर कीमत

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कलम के जादूगर: जयप्रकाश मानस, जिनकी कहानियां दिल को छू लेती हैं, एक बार फिर हमें सोचने पर मजबूर कर रहे हैं। रायगढ़ की अपनी जड़ों से जुड़े और ओड़िया साहित्य की गहरी समझ रखने वाले मानस जी ने हिंदी में ऐसा लेखन किया है जो भाषा की सीमाओं से परे है। भाषा विज्ञान और आईटी की उनकी पृष्ठभूमि उन्हें मानवीय भावनाओं और आधुनिक दुनिया के कटु सत्यों को एक साथ बुनने में मदद करती है। 'बची हुई हवा' श्रृंखला की यह अंतिम कहानी उस मासूमियत पर पड़े युद्ध के घाव को दिखाती है, जो अक्सर बड़ी-बड़ी रणनीतियों और समझौतों में कहीं खो जाती है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि सबसे बड़ा नुकसान इमारतों का नहीं, बल्कि बच्चों के टूटे बचपन का होता है।

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आज की लघुकथा: 'खिलौना और बच्चा'

रहमान के हाथ में वह गुड़िया पहली बार तब आई जब उसकी छोटी बहन लीना को अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने उसके जले हुए हाथ को काट दिया था। माँ ने रोते हुए उसे यह गुड़िया दी – जिसका बायां हाथ ठीक उसी जगह से टूटा हुआ था जहाँ से लीना का हाथ।

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हर रात बिस्तर पर लेटकर वह गुड़िया से बातें करता: "तुम्हारा भी दर्द होता है न?" गुड़िया की चुप्पी में उसे लीना की हँसी सुनाई देती। कभी वह गुड़िया के टूटे हाथ पर मरहम लगाता, ठीक वैसे ही जैसे नर्सों ने लीना का हाथ बाँधा था।

उस सुबह जब आसमान से आग बरसने लगी, रहमान ने गुड़िया को चिपटाया और माँ के पीछे-पीछे भागा। एक ज़ोरदार धमाके में सब कुछ काँप उठा। जब धुआँ छँटा तो रहमान अकेला था – उसकी माँ का हाथ दीवार के नीचे दबा था, बिल्कुल उस गुड़िया के टूटे हाथ की तरह।

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बचावकर्मियों ने जब उसे निकाला, तो उसकी मुट्ठी में गुड़िया का वही टूटा हाथ था। उसकी अपनी बाँह से खून बह रहा था, पर वह रो नहीं रहा था। शायद अब उसे समझ आ गया था कि असली दर्द क्या होता है।

एक नर्स ने धीरे से कहा: "इस बच्चे ने अपना खिलौना नहीं, अपना बचपन खो दिया है।"

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