मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती श्रीमद् भगवदगीता, मन्वंतर तक मनुष्यता और देवलोक की प्राप्ति का खुला द्वार

3
Advertisement

सनातन धर्म के सर्वाधिक पूजनीय और दार्शनिक ग्रंथ श्रीमद् भगवदगीता की महिमा का गुणगान करते हुए आध्यात्मिक विद्वानों और मनीषियों ने इसे मानव कल्याण का सबसे सुगम मार्ग बताया है. श्रीमद् भगवदगीता माहात्म्य के अनुसार इस पवित्र ग्रंथ का नित्य पाठ न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है बल्कि जीवात्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर दिव्य लोकों की प्राप्ति भी कराता है. आध्यात्मिक गणनाओं और शास्त्रों के गहन विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि जो मनुष्य पूर्ण भक्तिभाव से युक्त होकर प्रतिदिन गीता के मात्र एक अध्याय का भी पाठ करता है, उसकी आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है और वह मृत्यु के पश्चात सीधे रुद्रलोक को प्राप्त होता है. ऐसे पुण्यशाली साधक को भगवान शिव के सानिध्य में उनके गण के रूप में चिरकाल तक निवास करने का सौभाग्य प्राप्त होता है, जो किसी भी साधक के लिए परम सिद्धि का विषय है.

गीता की महिमा इतनी व्यापक है कि इसकी अल्प साधना भी मनुष्य को अधम योनियों में जाने से बचा लेती है. शास्त्रों में पृथ्वी को संबोधित करते हुए स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यदि कोई मनुष्य व्यस्तता के कारण संपूर्ण पाठ नहीं कर पाता, लेकिन वह नित्य नियम से केवल एक अध्याय, एक श्लोक या श्लोक के मात्र एक चरण का भी पाठ करता है, तो उसे एक मन्वंतर की लंबी अवधि तक पुनः मनुष्यता प्राप्त करने का वरदान मिलता है. यह इस बात का प्रमाण है कि गीता का एक-एक शब्द दैवीय ऊर्जा से ओतप्रोत है जो साधारण मनुष्य को भी पतन से बचाकर सभ्यता और मानवता के ऊंचे पायदान पर खड़ा कर देता है. कलियुग के इस कठिन समय में जहां मन विचलित रहता है, वहां गीता का लघु पाठ भी अमृत के समान फलदायी सिद्ध होता है.

यहां भी पढ़े:  सोना हुआ सस्ता या बढ़ गए दाम? जानें आज बुधवार को आपके शहर में क्या है गोल्ड-सिल्वर का रेट

इस पावन ग्रंथ के माहात्म्य की चर्चा करते हुए यह भी बताया गया है कि साधना की मात्रा के अनुसार पुण्य लोकों की प्राप्ति सुनिश्चित होती है. जो श्रद्धालु नियमित रूप से गीता के दस, सात, पाँच, चार, तीन, दो, एक या कम से कम आधे श्लोक का भी श्रद्धापूर्वक पाठ करते हैं, वे निश्चित रूप से दस हजार वर्षों तक चंद्रलोक के सुखों का उपभोग करते हैं. यह दिव्य गणना दर्शाती है कि भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निकली वाणी का लेशमात्र स्पर्श भी आत्मा को दैवीय आनंद से सराबोर कर देता है. गीता का पाठ करने वाले मनुष्य के लिए सबसे बड़ा आश्वासन यह है कि यदि इस साधना के दौरान या गीता के पठन-पाठन में लगे हुए अवस्था में उसकी मृत्यु होती है, तो उसे पशु आदि की अधम योनियों में भटकना नहीं पड़ता. ऐसा व्यक्ति अपने संचित पुण्यों के प्रभाव से पुनः उत्तम कुल में मनुष्य जन्म पाता है, जहां से वह अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ा सके.

यहां भी पढ़े:  500% टैरिफ की धमकी के बाद लाल हुआ भारतीय शेयर बाजार, सेंसेक्स में 780 अंक तो निफ्टी-50 में आई इतनी गिरावट

धर्मशास्त्रों के मर्मज्ञों का कहना है कि गीता केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं बल्कि जीवन जीने की एक पूर्ण कला है, जिसका माहात्म्य व्यक्ति को भौतिक और पारलौकिक दोनों जगत में सफलता दिलाता है. आज के दौर में जहां अनिश्चितता और तनाव का माहौल है, वहां गीता का माहात्म्य यह संदेश देता है कि भक्ति मार्ग पर चला गया छोटा सा कदम भी व्यर्थ नहीं जाता. श्रीमद् भगवद गीता के श्लोकों की ध्वनि तरंगें वातावरण को शुद्ध करती हैं और निरंतर पाठ करने वाले व्यक्ति के भीतर सात्विक गुणों का विकास करती हैं. यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में गीता जयंती और नित्य गीता पाठ को विशेष महत्व दिया गया है. अंततः यह ग्रंथ मनुष्य को शिवत्व की ओर ले जाने वाला और चंद्रलोक जैसी दिव्य अनुभूतियों से साक्षात्कार कराने वाला एकमात्र सशक्त माध्यम है. जो मनुष्य इस दुर्लभ अवसर का लाभ उठाकर गीता की शरण में जाता है, उसका कल्याण निश्चित है.

यहां भी पढ़े:  बड़ी साजिश का खुलासा…नूंह का वकील पाकिस्तान के लिए कर रहा था जासूसी, 45 लाख रुपये हवाला से भेजे; गिरफ्तार
Advertisement