मौन की भाषा में लिखा जीवन: ‘तीन किरदार’ और भारतीय मध्यवर्ग की अंतर्कथा

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-अभिमनोज

राजेश कुमार सिन्हा का कहानी-संग्रह तीन किरदार पढ़ते हुए यह एहसास लगातार गहराता जाता है कि हम किसी किताब के पन्नों से नहीं, बल्कि अपने ही जीवन के आईने से गुज़र रहे हैं. यह 215 पृष्ठों में फैला, 33 कहानियों का संसार केवल कथाओं का संकलन नहीं, बल्कि उस भारतीय मध्यवर्गीय चेतना का आत्मीय दस्तावेज है, जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हँसते-मुस्कुराते हुए भी भीतर कहीं न कहीं टूटती रहती है. लेखक न तो किसी वर्ग को महिमामंडित करते हैं, न करुणा का प्रदर्शन करते हैं; वे जीवन को वैसा ही पकड़ लेते हैं जैसा वह है,अधूरा, संशयग्रस्त, दबावों से भरा हुआ और फिर भी उम्मीद से जुड़ा हुआ.

“कहानी किसी एक की नहीं होती, वह कहने वालों की भी है और सुनने वालों की भी”-कृष्णा सोबती का यह कथन तीन किरदार के आमुख में आते ही जैसे पूरे संग्रह की आत्मा को उद्घाटित कर देता है. राजेश कुमार सिन्हा ने इसे केवल उद्धरण की तरह नहीं रखा, बल्कि अपनी पूरी रचनात्मक यात्रा और कथा-दृष्टि का आधार बना लिया है. यह आमुख दरअसल लेखक के जीवन, लेखन और पुनः सृजन की उस यात्रा का आत्मस्वीकार है, जहाँ कहानी लिखना एक योजनाबद्ध कर्म नहीं, बल्कि समय, अनुभव और संवेदनाओं के पकने का स्वाभाविक परिणाम बनकर सामने आता है.सिन्हा के लिए कहानी किसी दूरस्थ कल्पना की उपज नहीं, बल्कि आसपास मौजूद संघर्षों, संवादों, सरोकारों और प्रतिबद्धताओं से स्वतः आकार लेने वाली सृष्टि है. यही कारण है कि यहाँ कथा का स्वर उपदेशात्मक नहीं, अनुभवजन्य है. असुरक्षा का एक स्थायी भाव-आर्थिक, भावनात्मक और अस्तित्वगत—हर कहानी की नसों में बहता है; पात्र उसे कहते नहीं, पर उनकी चुप्पियाँ, उनके निर्णय और उनके समझौते उसी भय का अनुवाद बन जाते हैं.

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बेगूसराय के एक साप्ताहिक अख़बार से शुरू होकर मुंबई की कर्मभूमि तक पहुँची यह रचनात्मक यात्रा, कविता, फिल्म पत्रकारिता, पटकथा लेखन और फिर एक लंबे अंतराल के बाद कहानियों में वापसी-यह सब तीन किरदार को केवल कथा-संग्रह नहीं रहने देता, बल्कि इसे एक जीवित साहित्यिक अनुभव बना देता है. आमुख में लेखक यह स्वीकार करते हैं कि कहानियाँ कहीं बाहर नहीं होतीं, वे हमारे आसपास बिखरी रहती हैं-संघर्षों, सरोकारों, संवादों और प्रतिबद्धताओं के रूप में. यही स्वीकारोक्ति इस संग्रह की सबसे बड़ी ताकत है.

‘तीन किरदार’ केवल तीन व्यक्तियों की कथा नहीं, बल्कि यह मानव व्यक्तित्व के तीन स्तरों का रूपक है:

1.   जो हम हैं

2.   जो हमें होना चाहिए

3.   जो समाज हमसे चाहता है

कहानी की सबसे बड़ी शक्ति उसके संवादों से अधिक उसके मौन में है. पात्र एक-दूसरे से बात करते हैं, पर संवाद नहीं कर पाते. यह आज के परिवारों की केन्द्रीय त्रासदी है,जहाँ साथ रहना है, समझना नहीं. यह कहानी उस भावनात्मक दूरी को रेखांकित करती है जिसे हम “सामान्य” मानकर जीते चले जाते हैं.

यहाँ लेखक कहीं यह नहीं कहते कि रिश्ते टूट रहे हैं-वे बस यह दिखाते हैं कि रिश्ते निभाए जा रहे हैं, जिए नहीं जा रहे.

इस संग्रह की 33 कहानियाँ-तीन किरदार, एटीएम, अनुत्तरित प्रश्न, घरेलू हिंसा, क्रेडिट कार्ड, खुदगर्ज, किडनैप, फेसबुक बॉय फ्रेंड, मेरा नाम कल्याणी है, कल्याणी सिंह, सुंदर की कहानी, हैलोवीन, प्रेम न बाड़ी उपजे, सिस्टम, एक सपने की मौत, ऑटोवाला, कर्मफल, स्त्रीधन, अब्दुल, जूनियर आर्टिस्ट, ग्रैंड मास्टर, मुझे भी तुमसे मिलना है-जैसे शीर्षक ही इस बात का संकेत देते हैं कि लेखक ने मध्यवर्गीय जीवन के कितने विविध कोनों को छुआ है. यह विविधता किसी बिखराव का कारण नहीं बनती; उलटे, एक साझा संवेदना इन्हें आपस में बाँधती है-जीवन को निभाने की जद्दोजहद.

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शीर्षक कहानी ‘तीन किरदार’ केवल तीन व्यक्तियों की कथा नहीं, बल्कि मानव व्यक्तित्व के तीन स्तरों का रूपक बन जाती है,जो हम हैं, जो हमें होना चाहिए और जो समाज हमसे चाहता है. इसकी सबसे बड़ी शक्ति संवादों से अधिक उसके मौन में है. पात्र एक-दूसरे से बात करते हैं, पर संवाद नहीं कर पाते. यह आज के परिवारों की केन्द्रीय त्रासदी है,जहाँ साथ रहना है, समझना नहीं. लेखक कहीं यह नहीं कहते कि रिश्ते टूट रहे हैं; वे बस यह दिखाते हैं कि रिश्ते निभाए जा रहे हैं, जिए नहीं जा रहे.

तीन किरदार की संवेदना चेख़व की याद दिलाती है, जहाँ साधारण घटनाओं में जीवन की विराट पीड़ा समाई रहती है; भाषा और शिल्प में रेमंड कार्वर जैसी सादगी है; सामाजिक यथार्थ के प्रति प्रतिबद्धता प्रेमचंद की परंपरा से संवाद करती है; और स्त्री-अनुभवों की सूक्ष्म पकड़ में एलिस मुनरो की अनुगूँज सुनाई देती है. फिर भी यह संग्रह पूरी तरह अपनी मिट्टी का है.भारतीय मध्यवर्ग की स्थानीय, पहचानी हुई दुनिया, जहाँ संस्कार, भय, नैतिकता और समझौते एक-दूसरे में गुँथे रहते हैं.

स्त्री-केंद्रित कहानियाँ-स्त्रीधन, मृगतृष्णा, मेरे हिस्से का दुःख-घोषणाओं से परे, जीवन के धरातल पर खड़ी दिखाई देती हैं. यहाँ स्त्री-पात्र पीड़ित अवश्य हैं, पर निरीह नहीं. वे क्रांति नहीं करतीं, पर एक ऐसा मौन प्रतिरोध रचती हैं जो कहीं अधिक मारक है. बिना आरोप लगाए लेखक यह संकेत देते हैं कि पितृसत्ता केवल पुरुष नहीं निभाते; कई बार स्त्रियाँ भी उसे अनजाने में आगे बढ़ाती हैं. यह सच कहा नहीं जाता-महसूस कराया जाता है.

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तकनीकी युग की छायाएँ-एटीएम, क्रेडिट कार्ड, फेसबुक बॉय फ्रेंड-इन कहानियों में नए किस्म के अकेलेपन का प्रतीक बनती हैं. यहाँ पैसा केवल मुद्रा नहीं, बल्कि सत्ता और संवेदना के बीच खिंची एक महीन रेखा है; संबंध धीरे-धीरे ट्रांजैक्शन में बदलते दिखते हैं. ‘ग्रैंड मास्टर’ में शतरंज के रूपक के सहारे जीवन और नियति का द्वंद्व सामने आता है—हम सब मोहरे हैं, पर हर मोहरे के पास एक ऐसी चाल होती है जो खेल की दिशा बदल सकती है.

जो सबसे महत्वपूर्ण है और सबसे कम कहा गया,वह यह कि यह संग्रह पाठक को दोषी नहीं ठहराता. यह नायक-खलनायक नहीं बनाता. यह बस आईना रख देता है और चुप हो जाता है. उसी चुप्पी में वह प्रश्न जन्म लेता है जो किसी भी बड़े साहित्य की पहचान है: क्या हम सचमुच अपना जीवन जी रहे हैं, या केवल निभा रहे हैं? तीन किरदार इसी प्रश्न के साथ पाठक के भीतर चलता रहता है-ठीक वैसे ही, जैसे हमारी अपनी ज़िंदगी.

पुस्तक : तीन किरदार (कहानी संग्रह)
लेखक: राजेश कुमार सिन्हा
अमेजन से खरीदने के लिए लिंक : https://hostwebs.site/ylS0pL
प्रकाशक: आर. के. पब्लिकेशन
1/12, पारस दूबे सोसायटी,
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