मकर संक्रांति पर इस साल बन रहा दुर्लभ संयोग, उत्तरायण सूर्य के साथ बरसेगी अक्षय पुण्य की कृपा

3
Advertisement

भारतीय संस्कृति के सर्वाधिक महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक पर्वों में से एक मकर संक्रांति इस वर्ष 14 जनवरी 2026, बुधवार को अत्यंत हर्षोल्लास और विशेष खगोलीय योग के साथ मनाई जाएगी। खगोल शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र के अद्भुत समन्वय वाले इस पर्व को लेकर देशभर के तीर्थ स्थलों और विशेषकर जबलपुर के नर्मदा तटों पर तैयारियां जोरों पर हैं। ज्योतिष गणना के अनुसार इस वर्ष संक्रांति का पुण्यकाल दोपहर 03 बजकर 13 मिनट से शुरू होकर सूर्यास्त तक रहेगा, जिसे आध्यात्मिक साधना और दान-पुण्य के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जा रहा है। मकर संक्रांति का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ समझने के लिए हमें आकाश मंडल की 12 राशियों के चक्र को देखना होता है, जिसमें मकर दसवीं राशि है और 'मकर' का अर्थ संस्कृत में घड़ियाल या मगरमच्छ होता है। जब ऊर्जा और प्रकाश के पुंज सूर्य देव धनु राशि की अपनी यात्रा पूर्ण कर अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश करते हैं, तो इस संक्रमण काल को ही मकर संक्रांति के रूप में पूरे भारतवर्ष में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है।

यहां भी पढ़े:  दिसंबर में कार खरीदने का सुनहरा मौका, जमकर मिल रहे डिस्काउंट, कई मॉडल पर 2 लाख रुपये तक की बचत

इस पर्व का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व इतना गहरा है कि स्वयं भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण को 'देवताओं का दिन' और दक्षिणायन को 'देवताओं की रात' कहा गया है। ऐसी मान्यता है कि इस समय देह त्यागने पर जीवात्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मकर संक्रांति संबंधों की मधुरता का भी प्रतीक है, क्योंकि इस दिन सूर्य देव स्वयं अपने पुत्र शनि के घर उनसे मिलने जाते हैं, जिनसे उनके वैचारिक मतभेद थे। यह दिन समाज को संदेश देता है कि कड़वाहट और अहंकार को त्याग कर प्रेम और सद्भाव की दिशा में कदम बढ़ाना ही वास्तविक 'संक्रांति' है। भारतीय जीवन पद्धति में यह पर्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कृषि और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का भी दिन है। किसान अपनी नई फसल के आने की खुशी में प्रकृति और सूर्य देव को धन्यवाद अर्पित करते हैं, जो उनके जीवन को पोषण प्रदान करते हैं।

यहां भी पढ़े:  इजरायल की एयर स्ट्राइक, लेबनान में हिज्बुल्ला और हमास के ठिकानों को बनाया निशाना

शास्त्रों में इस दिन के लिए एक विशेष दिनचर्या का उल्लेख मिलता है, जिसे अपनाने से व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक शांति प्राप्त होती है। ब्रह्म मुहूर्त में स्नान, विशेषकर जल में काले तिल और गंगाजल मिलाकर स्नान करना, इस दिन की सबसे महत्वपूर्ण विधि मानी गई है। मत्स्य पुराण के अध्याय 98 में स्पष्ट उल्लेख है कि संक्रांति के दिन किया गया स्नान और दान अक्षय होता है, यानी इसका फल कभी समाप्त नहीं होता। स्नान के पश्चात उगते सूर्य को तांबे के लोटे से जल अर्पित करना और 'ॐ ह्रां ह्रीं स: सूर्याय नम:' मंत्र का जाप करना आत्मिक ओज और तेज प्रदान करता है। इस दिन तिल का 'षट प्रयोग' यानी तिल से स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, भोजन और दान करने का विशेष विधान है, जिसे पद्म पुराण में पापों का नाश करने वाला बताया गया है। खिचड़ी का भोग लगाना और दान करना इस पर्व की एक अनिवार्य परंपरा है, जिसके पीछे गहरा ज्योतिषीय कारण छिपा है। खिचड़ी में उपयोग होने वाले चावल चंद्रमा का, उड़द शनि का, हल्दी बृहस्पति का और घी सूर्य का प्रतीक माना जाता है, जिससे कुंडली के प्रमुख ग्रह शांत और संतुलित होते हैं।

यहां भी पढ़े:  मेक्सिको में टैरिफ वृद्धि, भारत की ऑटो कंपनियों की मुनाफाखोरी पर असर

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी मकर संक्रांति का अत्यधिक महत्व है। मकर संक्रांति के समय सूर्य की किरणें उत्तर की ओर मुड़ने लगती हैं, जिससे वातावरण में ठंड कम होने लगती है और धूप में 'विटामिन-डी' की प्रचुरता बढ़ जाती है। आयुर्वेद के अनुसार, इस मौसम में तिल और गुड़ का सेवन शरीर को भीतर से गर्म रखने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है। तांबे के पात्रों का दान और ऊनी वस्त्रों का वितरण न केवल धार्मिक पुण्य है, बल्कि समाज के जरूरतमंद तबके की सहायता करने का एक मानवीय पक्ष भी है। भविष्य पुराण और नारद पुराण जैसे ग्रंथों में संक्रांति महात्म्य के अंतर्गत बताया गया है कि इस दिन किया गया पितृ तर्पण अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्रदान करता है और व्यक्ति को आरोग्य की प्राप्ति होती है।

Advertisement