आत्मसमर्पण का शिखर: आदि शंकराचार्य रचित 'भवानी अष्टकम' अर्थ सहित

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 साक्षात शिव शंकर के अवतार माने जाने वाले आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'भवानी अष्टकम' भक्ति और शरणागति का सबसे सुंदर उदाहरण है। इसमें भक्त अपने अहंकार और सांसारिक ज्ञान का त्याग कर पूर्णतः माँ भवानी की शरण में जाता है। जब मनुष्य संसार की मोह-माया, रिश्तों और अपने ज्ञान-अहंकार से थक जाता है, तब वह माँ भवानी के चरणों में स्वयं को समर्पित कर देता है। इस स्तोत्र की अद्वितीय विशेषता यह है कि इसमें भक्त स्वीकार करता है कि वह न तो विद्वान है, न पुण्यात्मा, न ही कर्मकांडी; वह तो बस अपनी 'माँ' का एक दीन बालक है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन समय में जब सब साथ छोड़ दें, तब केवल दैवीय शक्ति ही हमारी वास्तविक 'गति' (सहारा) होती है।

॥ भवान्यष्टकम् ॥

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता। न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥१॥ भावार्थ: हे भवानी! पिता, माता, भाई, बहन, दाता, पुत्र, पुत्री, सेवक, स्वामी, पत्नी, विद्या और व्यापार—इनमें से कोई भी मेरा नहीं है। हे माँ! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, मैं केवल आपकी शरण हूँ।

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भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः। कुसंसार-पाश-प्रबद्धः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥२॥ भावार्थ: हे माँ, मैं जन्म-मरण के इस अपार भवसागर में पड़ा हुआ हूँ और इसके दुखों से अत्यंत भयभीत हूँ। मैं कामनाओं, लोभ और मद से भरा हुआ हूँ तथा इस मायारूपी संसार के बंधनों में बँधा हूँ। हे भवानी! अब तुम्हीं मेरी एकमात्र गति हो।

न जानामि दानं न च ध्यानयोगं न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम्। न जानामि पूजां न च न्यासयोगं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥३॥ भावार्थ: हे माँ! न मैं दान देना जानता हूँ, न ध्यान-योग का ज्ञान है। मुझे न तंत्र पता है, न स्तोत्र और मंत्र। न मैं पूजा जानता हूँ और न ही न्यास-योग जैसी क्रियाएँ। हे भवानी! मुझ अज्ञानी की एकमात्र तुम्हीं गति हो।

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्। न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मात- र्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥४॥ भावार्थ: हे जननी! मैं न पुण्य जानता हूँ, न तीर्थ। न मुझे मुक्ति का पता है न ईश्वर में विलीन होने का। भक्ति और व्रत का भी मुझे ज्ञान नहीं है। हे माँ! अब केवल तुम्हारा ही सहारा है।

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कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः कुलाचारहीनः कदाचारलीनः। कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहम् गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥५॥ भावार्थ: मैं कुकर्मी हूँ, बुरी संगति में रहने वाला हूँ, दुर्बुद्धि और दुष्ट स्वभाव वाला हूँ। मैं सदाचार से हीन और दुराचार में लीन रहने वाला हूँ। मेरी दृष्टि दूषित है और मैं सदा कटु वचन बोलता हूँ। हे भवानी! मुझ जैसे अधम की भी एकमात्र तुम्हीं गति हो।

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्। न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥६॥ भावार्थ: हे माँ! मैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा या किसी अन्य देवता को नहीं जानता। हे शरण देने वाली माँ! मैं तो बस तुम्हारी शरण में हूँ, तुम्हीं मेरी गति हो।

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये। अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥७॥ भावार्थ: हे भवानी! विवाद में, दुख में, प्रमाद (आलस्य) में, परदेश में, जल में, अग्नि में, पर्वतों पर, शत्रुओं के बीच और भयानक जंगल में सदा मेरी रक्षा करो। हे शरणदात्री! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो।

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अनाथो दरिद्रो जरा-रोगयुक्तो महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः। विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहम् गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥८॥ भावार्थ: हे माँ! मैं अनाथ हूँ, दरिद्र हूँ, बुढ़ापे और रोगों से ग्रस्त हूँ। मैं अत्यंत दुर्बल, दीन, मौन और विपत्तियों से घिरा हुआ हूँ। मेरा सब कुछ नष्ट हो चुका है। हे भवानी माँ! अब केवल तुम्हीं मेरी अंतिम गति हो।

॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं भवान्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥

भवानी अष्टकम का नियमित पाठ मनुष्य के भीतर से 'मैं' (अहंकार) को समाप्त कर विनम्रता का संचार करता है। यह स्तोत्र हमें विश्वास दिलाता है कि चाहे हम कितने भी दोषपूर्ण क्यों न हों, माँ की करुणा सबके लिए समान है। जो भक्त एकाग्रचित्त होकर इन आठ श्लोकों का गान करता है, वह भय, दुख और सांसारिक बाधाओं से मुक्त होकर परम शांति को प्राप्त करता है। यह स्तोत्र निराशा में डूबे मन के लिए आशा की एक दिव्य किरण है।

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