नई दिल्ली। भारत ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी स्वतंत्र रक्षा नीति और रणनीतिक स्वायत्तता का लोहा मनवाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि सैन्य साजो-सामान की खरीद किसी विचारधारा से प्रेरित नहीं होती बल्कि यह पूरी तरह से राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। विदेशी सचिव विक्रम मिस्री ने जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की भारत यात्रा के दौरान रक्षा सहयोग को लेकर पूछे गए एक अहम सवाल के जवाब में यह बयान दिया। गौरतलब है कि जर्मन चांसलर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात के दौरान सुरक्षा मुद्दों पर गहरे सहयोग की इच्छा जताई थी ताकि रक्षा क्षेत्र में भारत की रूस पर निर्भरता को कम किया जा सके। इस पर भारत की ओर से बेहद सधा हुआ और स्पष्ट रुख सामने आया है कि भारत अपनी रक्षा आवश्यकताओं के अनुसार ही यह तय करता है कि उसे दुनिया के किस हिस्से से और किस प्रकार के हथियार या तकनीक की खरीद करनी है। विदेश सचिव ने जोर देकर कहा कि सैन्य खरीद के मामले में भारत का दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यवहारिक है और इसे किसी एक देश के साथ संबंध होने या न होने के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की इस यात्रा को भारत-जर्मनी रक्षा संबंधों के एक नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। वर्तमान में भारत और जर्मनी के बीच छह अत्याधुनिक पनडुब्बियों के निर्माण को लेकर बातचीत काफी उन्नत चरण में है, जिसमें जर्मनी की 'थिसनक्रुप मरीन सिस्टम्स' और भारत के 'मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स' के बीच साझेदारी की योजना है। इस संदर्भ में चांसलर मर्ज़ ने संकेत दिया था कि जर्मनी अब रक्षा नीति के मामले में भारत के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदल रहा है और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए उत्सुक है। विदेश सचिव मिस्री ने इस बदलाव का स्वागत करते हुए स्वीकार किया कि जर्मनी से मिलने वाली रक्षा क्लीयरेंस में अब पहले की तुलना में काफी तेजी आई है और पुराना बैकलॉग लगभग खत्म हो चुका है। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि जर्मनी के साथ बढ़ती नजदीकी का मतलब यह नहीं है कि भारत किसी अन्य देश, विशेष रूप से रूस के साथ अपने पुराने और समय की कसौटी पर खरे उतरे रक्षा संबंधों को कम कर रहा है।
भारत और रूस के बीच सैन्य तकनीकी सहयोग दशकों पुराना है और यह महज एक खरीदार-विक्रेता संबंध से आगे बढ़कर अब संयुक्त अनुसंधान, डिजाइन विकास और अत्याधुनिक प्लेटफार्मों के उत्पादन तक पहुंच चुका है। भारतीय सेना वर्तमान में रूस निर्मित एस-400 लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली, टी-90 मुख्य युद्धक टैंक, सुखोई-30 एमकेआई और मिग-29के जैसे घातक हथियारों का सफलतापूर्वक उपयोग कर रही है। ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल और एके-203 असॉल्ट राइफलों का भारत में निर्माण इस अटूट रणनीतिक साझेदारी के सबसे बड़े उदाहरण हैं। भारत सरकार का मानना है कि रूस के साथ उसकी रक्षा साझेदारी 'रणनीतिक स्वायत्तता' का हिस्सा है, जिसे वह किसी तीसरे देश के दबाव में आकर प्रभावित नहीं होने देगा। भारत ने बार-बार यह संदेश दिया है कि उसकी भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए उसे विविधतापूर्ण रक्षा स्रोतों की आवश्यकता है।
जर्मनी के साथ प्रस्तावित पनडुब्बी सौदे पर चर्चा करते हुए विदेश सचिव ने बताया कि इस तरह के बड़े और तकनीकी रूप से जटिल सौदों में वित्तीय और वाणिज्यिक पहलुओं पर विस्तार से बातचीत की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि रक्षा मंत्रालय इस मामले में अधिक सटीक जानकारी दे सकता है, लेकिन अभी तक की बातचीत बेहद सकारात्मक रही है और दोनों पक्ष एक सुखद परिणाम की उम्मीद कर रहे हैं। भारत की यह नीति कि 'जहाँ सर्वोत्तम तकनीक और सबसे सुविधाजनक शर्तें मिलेंगी, वहीं से रक्षा खरीद होगी', विश्व के अन्य प्रमुख देशों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है। भारत अब रक्षा क्षेत्र में केवल आयात पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के तहत स्थानीय स्तर पर अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण को प्राथमिकता दे रहा है।
वैश्विक भू-राजनीति में हो रहे बदलावों के बीच भारत का यह रुख उसकी परिपक्व विदेश नीति को दर्शाता है। एक तरफ जहाँ भारत जर्मनी जैसे पश्चिमी देशों से उच्च-तकनीकी सहयोग और पनडुब्बी निर्माण जैसी तकनीकों का स्वागत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह रूस के साथ अपने पारंपरिक रक्षा संबंधों को भी मजबूती से बनाए हुए है। यह संतुलन भारत की उस बढ़ती वैश्विक शक्ति का परिचायक है जो अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए किसी एक खेमे या विचारधारा में बंधने के बजाय 'इंडिया फर्स्ट' यानी राष्ट्र सर्वोपरि की नीति पर चलता है। आने वाले समय में भारत और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग का नया आयाम न केवल भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाएगा बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की स्थिति को और अधिक सशक्त करेगा।






























