इस वर्ष 15 फरवरी 2026 को महाशिवरात्रि का पावन पर्व सर्वार्थ सिद्धि योग के शुभ संयोग में मनाया जाएगा. ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब महाशिवरात्रि जैसे पवित्र व्रत के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बनता है, तब भगवान शिव की आराधना विशेष फलदायी मानी जाती है. यह योग जीवन के सभी कार्यों में सफलता, सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करने वाला माना गया है.
धार्मिक ग्रंथों में महाशिवरात्रि व्रत का विशेष महत्व बताया गया है. स्कंदपुराण में उल्लेख है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में भूत, प्रेत, पिशाच और दिव्य शक्तियां सक्रिय रहती हैं और इस समय भगवान शिव की पूजा करने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं. इस दिन मध्य रात्रि में की गई पूजा को अत्यंत प्रभावशाली बताया गया है.
वहीं शिवपुराण के अनुसार रात्रि के चार प्रहरों में मध्य के दो प्रहर निशीथ काल कहलाते हैं. इस काल में भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उन्हें अभीष्ट फल प्राप्त होता है. शिवपुराण में यह भी वर्णित है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में भगवान शिव दिव्य ज्योति के रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान शिव माने जाते हैं. इस दिन व्रत, उपवास और रात्रि जागरण करने से भक्तों को विशेष पुण्य प्राप्त होता है. शास्त्रों में कहा गया है कि महाशिवरात्रि का व्रत पूरे वर्ष भगवान शिव की पूजा के समान फल देने वाला माना जाता है.
इसके अलावा ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि महाशिवरात्रि के दिन उपवास का विशेष महत्व है और इस दिन श्रद्धा तथा संयम के साथ किया गया व्रत अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है.
ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार सर्वार्थ सिद्धि योग सभी शुभ कार्यों को सिद्ध करने वाला योग माना जाता है. महाशिवरात्रि के साथ इस योग का संयोग भक्तों के लिए अत्यंत मंगलकारी माना जा रहा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है.
देशभर में श्रद्धालु इस पावन अवसर पर उपवास, शिवलिंग अभिषेक, रात्रि जागरण और मंत्र जाप के माध्यम से भगवान शिव की आराधना करेंगे.
*अर्ध रात्रि की पूजा के लिये स्कन्दपुराण में लिखा है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को 'निशिभ्रमन्ति भूतानि शक्तयः शूलभृद यतः . अतस्तस्यां चतुर्दश्यां सत्यां तत्पूजनं भवेत् ॥' अर्थात् रात्रिके समय भूत, प्रेत, पिशाच, शक्तियाँ और स्वयं शिवजी भ्रमण करते हैं; अतः उस समय इनका पूजन करने से मनुष्य के पाप दूर हो जाते हैं . शिवपुराण में आया है “कालो निशीथो वै प्रोक्तोमध्ययामद्वयं निशि ॥ शिवपूजा विशेषेण तत्काले ऽभीष्टसिद्धिदा ॥ एवं ज्ञात्वा नरः कुर्वन्यथोक्तफलभाग्भवेत्” अर्थात रात के चार प्रहरों में से जो बीच के दो प्रहर हैं, उन्हें निशीधकाल कहा गया हैं | विशेषत: उसी कालमें की हुई भगवान शिव की पूजा अभीष्ट फल को देनेवाली होती है – ऐसा जानकर कर्म करनेवाला मनुष्य यथोक्त फलका भागी होता है |*
*चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं. अत: ज्योतिष शास्त्रों में इसे परम कल्याणकारी कहा गया है. वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है. परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहा गया है. शिवरहस्य में कहा गया है .*
*“चतुर्दश्यां तु कृष्णायां फाल्गुने शिवपूजनम्. तामुपोष्य प्रयत्नेन विषयान् परिवर्जयेत.. शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्.”*
*शिवपुराण में ईशान संहिता के अनुसार “फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि. शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥” अर्थात फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोडों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए इसलिए इसे महाशिवरात्रि मानते हैं.*
*शिवपुराण में विद्येश्वर संहिता के अनुसार शिवरात्रि के दिन ब्रह्मा जी तथा विष्णु जी ने अन्यान्य दिव्य उपहारों द्वारा सबसे पहले शिव पूजन किया था जिससे प्रसन्न होकर महेश्वर ने कहा था की “आजका दिन एक महान दिन है | इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है, इससे मैं तुम लोगोंपर बहुत प्रसन्न हूँ | इसीकारण यह दिन परम पवित्र और महान – से – महान होगा | आज की यह तिथि ‘महाशिवरात्रि’ के नामसे विख्यात होकर मेरे लिये परम प्रिय होगी | इसके समय में जो मेरे लिंग (निष्कल – अंग – आकृति से रहित निराकार स्वरूप के प्रतीक ) वेर (सकल – साकाररूप के प्रतीक विग्रह) की पूजा करेगा, वह पुरुष जगत की सृष्टि और पालन आदि कार्य भी कर सकता हैं | जो महाशिवरात्रि को दिन-रात निराहार एवं जितेन्द्रिय रहकर अपनी शक्ति के अनुसार निश्चलभाव से मेरी यथोचित पूजा करेगा, उसको मिलनेवाले फल का वर्णन सुनो | एक वर्षतक निरंतर मेरी पूजा करनेपर जो फल मिलता हैं, वह सारा केवल महाशिवरात्रि को मेरा पूजन करने से मनुष्य तत्काल प्राप्त कर लेता हैं | जैसे पूर्ण चंद्रमा का उदय समुद्र की वृद्धि का अवसर हैं, उसी प्रकार यह महाशिवरात्रि तिथि मेरे धर्म की वृद्धि का समय हैं | इस तिथिमे मेरी स्थापना आदि का मंगलमय उत्सव होना चाहिये |*
*तिथितत्त्व के अनुसार शिव को प्रसन्न करने के लिए महाशिवरात्रि पर उपवास की प्रधानता तथा प्रमुखता है क्योंकि भगवान् शंकर ने खुद कहा है – “न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया. तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः..” 'मैं उस तिथि पर न तो स्नान, न वस्त्रों, न धूप, न पूजा, न पुष्पों से उतना प्रसन्न होता हूँ, जितना उपवास से.'*
*स्कंदपुराण में लिखा है “सागरो यदि शुष्येत क्षीयेत हिमवानपि. मेरुमन्दरशैलाश्च रीशैलो विन्ध्य एव च॥ चलन्त्येते कदाचिद्वै निश्चलं हि शिवव्रतम्.” अर्थात् ‘चाहे सागर सूख जाये, हिमालय भी क्षय को प्राप्त हो जाये, मन्दर, विन्ध्यादि पर्वत भी विचलित हो जाये, पर शिव-व्रत कभी निष्फल नहीं हो सकता.’ इसका फल अवश्य मिलता है.*
*‘स्कंदपुराण’ में आता है “परात्परं नास्ति शिवरात्रि परात्परम् | न पूजयति भक्तयेशं रूद्रं त्रिभुवनेश्वरम् | जन्तुर्जन्मसहस्रेषु भ्रमते नात्र संशयः||” ‘शिवरात्रि व्रत परात्पर (सर्वश्रेष्ठ) है, इससे बढ़कर श्रेष्ठ कुछ नहीं है | जो जीव इस रात्रि में त्रिभुवनपति भगवान महादेव की भक्तिपूर्वक पूजा नहीं करता, वह अवश्य सहस्रों वर्षों तक जन्म-चक्रों में घूमता रहता है |’*
*ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एकादशी को अन्न खाने से पाप लगता है और शिवरात्रि, रामनवमी तथा जन्माष्टमी के दिन अन्न खाने से दुगना पाप लगता है. अतः महाशिवरात्रि का व्रत अनिवार्य है.*






























