आज की लघुकथा: ‘बीज की पुकार’
धरती माँ की गोद में एक छोटा-सा बीज पड़ा था। बरसों से वह अँधेरे में दबा हुआ था, लेकिन उसके भीतर जीवन की हल्की-सी धड़कन अब भी बाकी थी। पास ही खड़ा विशाल बरगद का पेड़ अपनी फैली शाखाओं से धरती को छाया दे रहा था। बीज ने धीरे से फुसफुसाकर पूछा, “बाबा, क्या मैं भी कभी तुम्हारी तरह विशाल बन पाऊँगा?”
बरगद ने अपनी पत्तियों को हिलाते हुए मुस्कुराकर कहा, “बेटा, हर बीज के भीतर एक जंगल छिपा होता है। बस उसे सही समय और सही अवसर चाहिए।”
बीज की आवाज़ में उम्मीद तो थी, पर साथ ही भय भी था। “लेकिन बाबा, अब तो मिट्टी भी पहले जैसी नहीं रही। लोग खेतों में ज़हर घोल देते हैं, जंगलों को काट देते हैं, और हमें उगने से पहले ही कुचल देते हैं।”
बरगद की शाखाएँ एक पल को स्थिर हो गईं। उसने गहरी साँस ली और बोला, “हाँ बेटा, इंसान अपनी जल्दी में यह भूल गया है कि जीवन का संतुलन क्या होता है। वो सोचता है कि पेड़ सिर्फ लकड़ी हैं, और बीज केवल व्यापार की चीज़।”
बीज ने धीरे-धीरे मिट्टी में करवट ली। “क्या इंसान नहीं समझता कि अगर हम नहीं रहेंगे, तो उसकी साँसें भी नहीं बचेंगी?”
बरगद ने अपनी जड़ों को और गहरा करते हुए कहा, “वो समझता है, लेकिन उसका लालच उसकी समझ को ढक देता है। उसे तुरंत फल चाहिए, चाहे उसके लिए भविष्य क्यों न उजड़ जाए।”
तभी पास से गुजरते एक किसान के कदमों की आहट आई। वह थका हुआ था और उसकी आँखों में चिंता साफ झलक रही थी। उसने मिट्टी को हाथ में लेकर कहा, “अब पहले जैसी उपज नहीं रही। खेत सूखते जा रहे हैं।”
बीज ने बरगद से पूछा, “क्या यह वही इंसान है जो हमें काटता है?”
बरगद ने शांत स्वर में कहा, “हाँ बेटा, वही इंसान कभी हमें लगाता भी है और कभी काट भी देता है। उसके भीतर दो संसार बसते हैं – एक सृजन का और एक विनाश का।”
किसान ने मिट्टी में एक नया बीज बोया और आसमान की ओर देखकर बोला, “हे प्रकृति, इस बार मुझे निराश मत करना।”
बीज मुस्कुराया। “बाबा, देखो… उसने फिर बीज बोया है। शायद अभी उम्मीद बाकी है।”
बरगद की शाखाएँ हवा में झूम उठीं। “हाँ बेटा, जब तक इंसान उम्मीद बोता रहेगा, धरती जीवन देती रहेगी। लेकिन उसे यह याद रखना होगा कि बीज को सिर्फ मिट्टी नहीं, प्रेम भी चाहिए।”
धीरे-धीरे बादल घिरने लगे। पहली बूंद मिट्टी पर गिरी तो बीज के भीतर जीवन की लहर दौड़ गई। उसने महसूस किया कि अँधेरे के भीतर भी उजाले का रास्ता छिपा होता है।
बीज ने आखिरी बार बरगद से कहा, “बाबा, अगर मैं पेड़ बन गया तो मैं क्या करूँगा?”
बरगद ने गर्व से कहा, “तू बस छाया देना, फल देना और यह याद दिलाना कि प्रकृति किसी एक की नहीं, सबकी है।”
बीज चुप हो गया। मिट्टी ने उसे अपने भीतर समेट लिया। लेकिन उसके भीतर अब डर नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की हलचल थी।
कल का संकेत:
कल की कहानी ‘नदी का प्रश्न’ हमें उस वेदना से रूबरू कराएगी, जहाँ बहती जलधारा इंसान से पूछेगी – क्या विकास के नाम पर उसका अस्तित्व मिटाना उचित है? क्या नदी सिर्फ पानी है या जीवन की आत्मा? कल पढ़िए…






























