पुस्तक समीक्षा: संवेदनाओं का अद्भुत संसार है "मेरे मन का मस्त परिंदा"

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पुस्तक समीक्षा: नीलम सक्सेना चंद्रा 

हिंदी कविता का संसार जितना
 व्यापक है, उतना ही संवेदनशील भी. समय बदलते रहे हैं, शहरों की चकाचौंध बढ़ी हैं, लोगों के जीवन में व्यस्तताएँ शुमार हो चुकी हैं, लेकिन कविता की ज़रूरत कम नहीं हुई. सच तो यही है कि जितना आधुनिक जीवन मनुष्य के भीतर खालीपन पैदा करता गया, उतनी ही कविता ने उसकी छिपी हुई दरारों को सहलाने की कोशिश की है. समकालीन हिंदी काव्य में कुछ आवाज़ें ऐसी हैं, जो इस टूटन, इस बेचैनी, इस थकी हुई आत्मा को शब्दों की एक ऐसी संध्या देती हैं जिसमें मन आराम से बैठ सके और खुद से बातें कर सके. उन्हीं आवाज़ों में एक सजग, सधी और गहन आवाज़ है नीलम सक्सेना चन्द्रा की जो पिछले कई वर्षों से निरंतर अपने लेखन से हिंदी कविता को एक नई संवेदनशील ऊँचाई देती रही हैं. उनका ऑथर्स प्रेस से प्रकाशित हालिया काव्य-संग्रह "मेरे मन का मस्त परिंदा"  अपने भीतर अनुभवों, स्मृतियों, आकांक्षाओं, रिश्तों, संघर्षों और प्रकृति के स्पर्श का एक अद्भुत संसार लेकर आता है. पूर्व रेलवे कोलकाता में मुख्य विद्युतीय अभियंता के पद पर कार्यरत नीलम सक्सेना अपने साहित्य प्रेम के लिए कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजी जा चुकी हैं और उनकी साहित्यिक सक्रियता निरंतर बनी हुई है.

"मेरे मन का मस्त परिंदा" में शामिल कविताएँ किसी एक बिंब या एक मनोदशा से बंधी नहीं रहतीं. वे स्वतंत्र हैं, बल्कि यह कहना चाहिए कि स्वतंत्रता का उत्सव मनाती हैं. यही कारण है कि संग्रह के शीर्षक में आया “मस्त परिंदा” सिर्फ एक प्रतीक नहीं, बल्कि उस मनुष्य का सच्चा प्रतिनिधि है जो जीवन की तमाम बाधाओं के बावजूद उड़ना चाहता है, कभी रुककर अपने पंखों को समझना चाहता है, और कभी आसमान को देखकर अपने भीतर की गुमशुदा रोशनी को तलाशना चाहता है.नीलम सक्सेना की कविताएँ अत्यधिक सजावट नहीं मांगतीं. वे शब्दों की चकाचौंध से दूर, बेहद सादे और सहज दिखाई देने वाले वाक्यों में गहरे से गहरा अर्थ कह जाती हैं और यही उनकी खासियत है. एक साधारण सा वाक्य, एक हल्का सा दृश्य, एक रोजमर्रा का क्षण उनकी कविताओं में अचानक इतने बड़े भाव में बदल जाता है कि पाठक चकित रह जाता है. यही वजह है कि मेरे मन का मस्त परिंदा पढ़ते समय बार बार ऐसा लगता है कि यह संग्रह अपनी सहजता में जितना सरल है, अपनी अंतर्ध्वनि में उतना ही विशाल.संग्रह की कविताएँ एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक साझा धागे से बंधी हुई प्रतीत होती हैं और यह साझा धागा है मनुष्य की भीतरी यात्रा. मनुष्यता का वह हिस्सा जिसे अक्सर हम बड़े होते होते खो देते हैं. कवयित्री इस यात्रा को इतने सहज ढंग से पकड़ती हैं कि लगता है जैसे वे कविता नहीं, दिल की धड़कन लिख रही हों.संग्रह की कई कविताएँ इस भाव संसार को और अधिक चरितार्थ करती हैं और एक पाठक धीरे धीरे उनसे रूबरू होता चला जाता है.

“होली”, “मेरी पहचान”, “रज़”, “तस्वीरें”, “वो शाहकार”, “मधुमालती”, “तुम्हीं से”, “माँ”, “बारिश और ख़्वाहिश”, “दिशाहीन”, “बे-क़ाफ़िया” और “दूरियाँ” आदि  कविताएँ मिलकर इस संग्रह के भाव नक्षत्र का एक विस्तृत, परिष्कृत और बहुस्तरीय मानचित्र बनाती हैं.संग्रह की शुरुआत रंगों के उसी उन्मुक्त आश्वासन से होती है जो “होली” कविता में दिखाई देता है. यहाँ होली कोई बाहरी उत्सव नहीं रहती; यह भीतर बसने वाली एक छिपी हुई चहक है. कविता में रंग किसी चेहरे, किसी दीवार या किसी उत्सव पर नहीं लगते वे मन पर लगते हैं. कभी किसी स्मृति की तरह, कभी किसी चोट की तरह, और कभी किसी कोमल खिलखिलाहट की तरह. नीलम सक्सेना इस कविता में रंगों के उस रूप को पकड़ती हैं जो किसी टूटे मन को भी थोड़ी देर के लिए जगमगा सकता है. कविता पढ़ते हुए लगता है कि रंगों ने ही मनुष्य की खोती हुई संवेदनाओं को वापस लाने की कोशिश की है. इस संग्रह में “मेरी पहचान” वह कविता है जो स्वयं को खोजने की प्रक्रिया है. यह कविता किसी भी ऐसे व्यक्ति को अपनी लग सकती है जो इस भीड़भाड़ वाले संसार में अपनी जगह, अपनी आवाज़ और अपना वजूद तलाश रहा हो. इस कविता के भीतर मौजूद विवेक, विनम्रता और अस्मिता का भाव इसे संग्रह की पहचान तय करने वाली कविता बनाता है. नीलम जी यहाँ आत्म स्वीकृति के महत्व को अत्यंत कोमल लेकिन दृढ़ शब्दों में रखती हैं. कविता यह बताती है कि पहचान किसी मृग मरीचिका की तरह बाहर नहीं मिलती, उसे भीतर से ही जन्म लेना होता है. यह कविता आज के उन युवाओं, कामकाजी लोगों और संघर्षरत व्यक्तियों के जीवन से गहरे जुड़ती है जो हर दिन किसी न किसी सामाजिक तुलना, अपेक्षा या दबाव से जूझते हैं.“पथ अपना ढूँढो” कविता उसी संघर्ष को आगे ले जाती है, यहाँ कविता जीवन की कठिनाईयों को देखकर पीछे हटने की नहीं, बल्कि अपना रास्ता खोजने की हिम्मत देती है. कविता में जिस प्रकार से “टूटे हुए नाज़ुक से ज़िगर” की बात आती है, वह भावनात्मक रूप से बेहद सटीक है.

जीवन के हर रास्ते पर किसी न किसी मोड़ पर ऐसा क्षण आता है जब व्यक्ति भीतर से टूटने  लगता है लेकिन कविता यह वादा करती है कि टूटन का यह क्षण स्थायी नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की क्षमता को मजबूत करने वाला पड़ाव है. नीलम जी की कविता यहाँ प्रेरक होने के साथ साथ बेहद यथार्थवादी भी रहती है. वे न तो जीवन को अवास्तविक ऊँचाइयों पर ले जाती हैं और न ही दुख को अत्यधिक गाढ़ा करती हैं बल्कि दोनों का संतुलन कविता को अत्यंत प्रभावशाली बनाता है.“रज़” कविता जीवन के उन क्षणभंगुर पलों को पकड़ती है जिन्हें हम अक्सर अपनी व्यस्तता में अनदेखा कर देते हैं. कविता यह सिखाती है कि जीवन के कई बड़े सत्य छोटे छोटे क्षणों में छुपे रहते हैं. एक परिंदा आकाश छू ले, एक हवा गालों को सहला जाए, या मिट्टी पर बैठकर कोई पुराना गीत गुनगुना लिया जाए इनमें कोई महान दार्शनिकता नहीं दिखती, लेकिन यह सब मिलकर जीवन को अर्थ देते हैं. नीलम जी की कविताओं की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि वे बहुत कम शब्दों में बारीकी से पूरे जीवन को समेट लेती हैं. “रज़” कविता इसी का सर्वोत्तम उदाहरण है.

इस संग्रह में “तस्वीरें” एक  स्मृतिपरक सी कविता है. यह कविता स्मृतियों और वर्तमान के बीच उस पुल पर खड़ी है, जिसके दोनों ओर भावनाओं की धुंध है कहीं खुशियों की, कहीं पछतावे की, कहीं वापस लौट आने की तो कहीं कुछ खो देने की. कविता में जब कवयित्री कहती हैं कि “तस्वीरें सच भी बोलती हैं और झूठ भी”, तो वे सिर्फ स्मृतियों की बात नहीं कर रहीं, बल्कि मानवीय अनुभव का सबसे गहरा सत्य बता रही हैं. यह सच है कि जीवन की हर तस्वीर अपने भीतर का पूरा सच नहीं कहती उसमें हमेशा वह छूट जाता है जो तस्वीर के बाहर था, जो चेहरे के पीछे था, जो मुस्कुराहट की आड़ में छुपा था. यह कविता सिर्फ अतीत को याद नहीं करती, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं की जटिलता को पकड़ती है.“वो शाहकार” कविता सौंदर्य के उस अनदेखे आयाम की खोज है जो किसी वस्तु, दृश्य या घटना तक सीमित नहीं. यह कविता बेहद शालीन भाषा में यह प्रश्न करती है कि मनुष्य आखिर किस सौंदर्य के लिए तड़पता है? वह कौन-सा पल, कौन सा दृश्य, कौन सा क्षण है जो आत्मा को ठंडक देता है? नीलम जी इस कविता को किसी दार्शनिक ग्रंथ की तरह नहीं लिखतीं यों तो यह कविता बहुत सरल दिखती है लेकिन पढ़ने के बाद काफी देर तक मन में बनी रहती है. यहाँ कवयित्री मानो यह कह रही हों कि सौंदर्य वह नहीं जिसे देखा जाए बल्कि सौंदर्य वह है जिसे महसूस किया जाए. स्वार्थ, शोर, व्यस्तता और अराजकता के बीच भी मनुष्य ऐसी किसी चीज़ की तलाश करता है जो उसे थोड़ी देर को ही सही, पर शांति दे सके.“मधुमालती” संग्रह की उन कविताओं में से है जो प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध को बहुत सुंदर ढंग से उजागर करती है.

मधुमालती यहाँ सिर्फ फूल नहीं, बल्कि एक ऐसी सहचरी है जो मौसमों के साथ बदलती हुई भी अपने प्रेम, अपनी खुशबू और अपने कोमल स्पर्श को खोने नहीं देती. यह कविता अत्यंत कोमल है जो एक फूल के माध्यम से जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में भी आशा, धैर्य और खुशी बनाए रखने की प्रेरणा देती हैऔर महामारी के अंधेरे समय में इस फूल का मनुष्य को साहस देना कविता का केन्द्रीय भाव बन जाता है.“तुम्हीं से” कविता समर्पण, प्रेम और अपनत्व का अद्भुत समावेश है. यह कविता किसी एक व्यक्ति को संबोधित नहीं लगती; बल्कि यह कविता उन सभी व्यक्तियों के लिए है जिन्होंने किसी के प्रेम, किसी के सहारे, किसी की उपस्थिति से जीवन में कुछ नया पाया है . इस कविता में जिस सहजता से प्रेम की गरिमा रखी गई है, वह मन को छू जाती है. “मेरी आस, मेरे पास, मेरा एहसास” ये शब्द किसी गीत की तरह बहते हुए पाठक के भीतर उतर जाते हैं. कविता यह बताती है कि जीवन में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनसे हमारा संसार बनता है, खिलता है, और उनकी अनुपस्थिति में वही संसार थककर धुंधला पड़ने लगता है. इस संग्रह में “माँ” कविता एक बेहद मार्मिक क्षण को पकड़ती है. माँ के अंतिम समय को शब्द देना स्वयं में कठिन कार्य है, पर कवयित्री इसे पूरी संवेदनशीलता के साथ लिखती हैं. माँ यहाँ शरीर से विदा हो रही हैं, लेकिन कविता स्पष्ट कहती है कि माँ कभी पूरी तरह नहीं जातीं वे हमारी देह, हमारी स्मृतियों, हमारे संस्कारों और हमारे स्वभाव में जीवित रहती हैं. कविता के शब्द बहुत सरल हैं, लेकिन भाव अत्यंत गहरे और दर्द से भरे हैं. इस कविता को पढ़ना किसी भी व्यक्ति के लिए सहज नहीं; यह कविता पाठक को उसकी अपनी माँ, उसकी अपनी स्मृतियों और उसके अपने वियोग से जोड़ देती है.

“बारिश और ख़्वाहिश” कविता रिश्तों की बदलती परिभाषाओं को टटोलती है. आधुनिक जीवन की दुनिया में जहाँ परिवारों के बीच दूरी बढ़ रही है, यह कविता एक कड़वा लेकिन सच्चा चित्र प्रस्तुत करती है. बाहर तेज बारिश हो रही है, लेकिन भीग मन रहा है. कवयित्री उस क्षण का उल्लेख करती हैं जब बेटा फ़ोन तक नहीं करता और यह बिलकुल सच है कि यह किसी एक घर की कहानी नहीं है बल्कि यह आज के सामाजिक ढाँचे  के टूटते ताने बाने का रूपक है. कविता में कोई आरोप नहीं, कोई शिकायत नहीं सिर्फ एक चुप्पी है जो शब्दों में बदल गई है.“दिशाहीन” कविता मन की उस अव्यवस्थित, परेशान और बेचैन अवस्था को पकड़ती है जो कई बार बिना किसी स्पष्ट कारण के मनुष्य पर हावी हो जाती है. हवा दिशा बदल रही है, अंदर कोई अनाम सा डर उभर रहा है, रास्ते अनिश्चित हो रहे हैं ,यह कविता उस असुरक्षा की बात करती है जिसे मनुष्य अक्सर छुपा लेता है लेकिन कविता उसे व्यक्त कर देती है.

“बे-क़ाफ़िया” कविता जीवन की उस बेताल लय की कहानी है जिसे हम चाहकर भी ठीक नहीं कर पाते. जीवन क़ाफ़िया माँगता है, लेकिन मिलता नहीं. यह कविता हवा से संवाद करती है, स्मृतियों से बात करती है और फिर भी स्वीकार करती है कि जीवन हर बार कविता की तरह सुव्यवस्थित नहीं होता. इसी स्वीकार्यता में कविता की ताकत है.“दूरियाँ” शीर्षक कविता मनुष्यता के टूटते संबंधों पर एक प्रार्थना सी लगती है क्योंकि आज दुनिया बदल रही है, लोग दूर हो रहे हैं, रिश्तों के रातों की किस्मत अलग अलग होती है कोई अमावस है, कोई पूर्णमासी लेकिन कविता दुआ करती है कि कोई रिश्ता इतना न टूटे कि उसे जोड़ने में पूरी ज़िंदगी लग जाए. कविता का स्वर प्रार्थना जैसा है यानी मृदुल, शांत और गहरा.इन सभी कविताओं को एक साथ पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि मेरे मन का मस्त परिंदा केवल कविताओं का संग्रह नहीं है यह मनुष्य की भीतरी यात्रा का विस्तृत और बहुल अनुभव है. नीलम सक्सेना  की भाषा में सरलता है, पर भावों में गहराई असाधारण है.

वे भारी शब्दों का सहारा नहीं लेतीं; बल्कि वे जीवन को उसकी सहज, मुलायम, हल्की लेकिन गहन अवस्थाओं में पकड़ती हैं. उनकी कविताएँ पढ़कर ऐसा लगता है जैसे मनुष्य अपने भीतर की खोई हुई निश्छलता वापस पा रहा हो.कविताओं के साथ जुड़े चित्र इस काव्य-संग्रह को और परिष्कृत बनाते हैं. वे केवल सजावट नहीं हैं बल्कि वे कविताओं के भावों के दृश्यात्मक विस्तार हैं. किसी कविता के साथ लगे पत्तों की तस्वीर, किसी कविता के साथ लगी धूप की किरण, किसी कविता के साथ लगा पहाड़ आदि  मिलकर कविताओं को केवल पढ़ने का नहीं, बल्कि देखने और महसूस करने का अनुभव देते हैं.यह संग्रह आज की भारतीय कविता के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रयास है, क्योंकि यह आधुनिक जीवन के सभी तनावों, दबावों और बदलावों के बीच मनुष्य के लिए एक शांत कोना बनाता है. यह कविता पाठक को केवल भावुक नहीं करती; यह उसे समझने, आत्मान्वेषण करने और जीवन के सूक्ष्म क्षणों को महसूस करने की क्षमता भी देती है. नीलम सक्सेना चन्द्रा की यही खासियत है कि वे कविता को केवल कला नहीं, बल्कि आत्मा का साधन बना देती हैं.

"मेरे मन का मस्त परिंदा" पढ़ते पढ़ते पाठक यह महसूस करता है कि जीवन चाहे जैसा भी हो थका हुआ, टूटा हुआ, तेज़, उदास, अकेला या उलझा हुआ पर मन के भीतर कहीं न कहीं एक मस्त परिंदा अवश्य जीवित है. वही परिंदा कभी पंख फैलाता है, कभी आसमान नापता है, कभी थककर किसी डाल पर बैठ जाता है, पर उड़ना कभी नहीं भूलता. यह संग्रह उसी परिंदे का उत्सव है उसकी उड़ानों का, उसकी थकानों का, उसकी उम्मीदों का और उसके अनंत आकाश का. यह काव्य-संग्रह उन सभी पाठकों के लिए है जो आधुनिक जीवन की भटकन में अपने भीतर लौटने की इच्छा रखते हैं,जो छोटे-छोटे क्षणों में कविता ढूँढते हैं,जो स्मृतियों को दुबारा जी पाना चाहते हैं, जो रिश्तों के टूटते धागों को हाथ में लेकर भी उनसे मोह नहीं तोड़ पाते और सबसे बढ़कर, जो मनुष्य की भीतरी संवेदनाओं को समझने और महसूस करने की क्षमता रखते हैं.नीलम सक्सेना चन्द्रा ने इस संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया है कि कविता आज भी मनुष्य की सबसे विश्वसनीय सांत्वना है.

जब दुनिया बहुत तेज़ हो जाती है, जब लोग बहुत व्यस्त हो जाते हैं, जब रिश्ते बहुत औपचारिक हो जाते हैं तब कविता ही है जो मनुष्य को यह विश्वास दिलाती है कि उसके भीतर अभी भी कोमलता है."मेरे मन का मस्त परिंदा" हिंदी कविता की उस परंपरा को आगे बढ़ाता है जहाँ व्यक्तिगत अनुभवों को सामूहिक संवेदनाओं में बदला जाता है. यहाँ हर कविता भले ही नीलम सक्सेना जी ने लिखी हो पर अंततः पाठक की कविता बन जाती है और यही इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि है. बेशक,शायद यही वह कारण है कि यह संग्रह आने वाले वर्षों में भी अपनी प्रासंगिकता, अपनी भावनात्मक शक्ति और अपनी सौंदर्यात्मक सुंदरता के कारण पाठकों की स्मृति में बना रहेगा.
राजेश कुमार सिन्हा 
खार (वेस्ट) मुंबई 52

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