नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने दूरसंचार क्षेत्र से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट कर दिया है कि टेलीकॉम स्पेक्ट्रम किसी निजी कंपनी की संपत्ति नहीं बल्कि एक संप्रभु राष्ट्रीय संसाधन है, जिसका स्वामित्व केंद्र सरकार के पास है। अदालत ने कहा कि स्पेक्ट्रम “समुदाय का भौतिक संसाधन” है और इसका उपयोग आम भलाई के लिए होना चाहिए। टेलीकॉम सेवा प्रदाताओं को केवल इसके उपयोग का लाइसेंस मिलता है, मालिकाना हक नहीं।
न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि स्पेक्ट्रम को दिवाला या परिसमापन प्रक्रिया के तहत संपत्ति की तरह नहीं देखा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक स्वामित्व का विधिवत हस्तांतरण न हो, तब तक किसी प्रकार का मालिकाना अधिकार उत्पन्न नहीं होता।
पीठ ने कहा कि एक ओर केंद्र सरकार स्पेक्ट्रम की स्वामी और न्यासी है, वहीं दूसरी ओर भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण यानी ट्राई नियामक की भूमिका निभाता है। दोनों मिलकर दूरसंचार क्षेत्र के पूरे दायरे को नियंत्रित करते हैं। अदालत ने कहा कि इस संरचना को देखते हुए यह मानना गलत होगा कि टेलीकॉम कंपनियों को स्पेक्ट्रम पर स्वामित्व अधिकार प्राप्त है।
मामला एयरसेल से जुड़ी दिवाला कार्यवाही से संबंधित था। एयरसेल ने घरेलू बैंकों से लगभग 13,729 करोड़ रुपये का ऋण लिया था। कंपनी के बकाया चुकाने में विफल रहने के बाद भारतीय स्टेट बैंक सहित कई ऋणदाताओं ने दूरसंचार विभाग द्वारा आवंटित स्पेक्ट्रम पर दावा जताते हुए अपनी रकम की वसूली की मांग की थी। उनका तर्क था कि स्पेक्ट्रम लाइसेंस कंपनी की परिसंपत्ति का हिस्सा है और इसे दिवाला प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि स्पेक्ट्रम लाइसेंस में भले ही हस्तांतरणीयता और विशिष्ट उपयोग जैसे तत्व हों, लेकिन इससे स्वामित्व स्थापित नहीं होता। अदालत ने कहा कि लाइसेंसधारी को केवल सीमित अधिकार प्राप्त होते हैं, जो नियामक शर्तों और सरकारी नियंत्रण के अधीन होते हैं।
न्यायमूर्ति नरसिम्हा, जिन्होंने फैसला लिखा, ने कहा कि किसी टेलीकॉम कंपनी द्वारा अपने वित्तीय विवरण में स्पेक्ट्रम लाइसेंस को अमूर्त संपत्ति के रूप में दर्शाना स्वामित्व का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यह केवल भविष्य में संभावित आर्थिक लाभों पर नियंत्रण को दर्शाता है, न कि शीर्षक या स्वामित्व को।
फैसले में यह भी कहा गया कि स्पेक्ट्रम जैसे प्राकृतिक और राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए। अदालत ने दोहराया कि ऐसे संसाधनों पर अंतिम नियंत्रण सरकार के पास रहता है और उनका आवंटन सार्वजनिक हित को ध्यान में रखकर किया जाता है।
इस निर्णय से स्पष्ट हो गया है कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के तहत स्पेक्ट्रम लाइसेंस को परिसंपत्ति पूल में शामिल नहीं किया जा सकता। इससे बैंकिंग क्षेत्र और टेलीकॉम उद्योग दोनों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब ऋणदाता संस्थानों को टेलीकॉम कंपनियों को ऋण देते समय जोखिम का आकलन नए सिरे से करना होगा, क्योंकि स्पेक्ट्रम को सुरक्षा के रूप में दावा करना संभव नहीं होगा।
कानूनी विश्लेषकों का कहना है कि यह फैसला सरकार के राष्ट्रीय संसाधनों पर अधिकार को मजबूत करता है और भविष्य में इसी तरह के विवादों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत स्थापित करता है। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि लाइसेंस आधारित ढांचे में कार्यरत उद्योगों में स्वामित्व और उपयोग अधिकार के बीच अंतर को समझना आवश्यक है।
इसी बीच दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ट्राई ने उपभोक्ता हितों से जुड़े कुछ नए कदमों की भी घोषणा की है। ट्राई के अध्यक्ष अनिल कुमार लाहोटी ने बताया कि डू नॉट डिस्टर्ब ऐप में एक अपील सुविधा जोड़ी जाएगी, जिससे उपभोक्ता अपनी शिकायत के असंतोषजनक निस्तारण की स्थिति में उच्च प्राधिकरण के पास मामला ले जा सकेंगे।
उन्होंने यह भी जानकारी दी कि ट्राई मार्च में संशोधित माय कॉल ऐप लॉन्च करेगा, जिससे उपभोक्ता कॉल की गुणवत्ता को लेकर शिकायत दर्ज करा सकेंगे। नियामक का उद्देश्य सेवा गुणवत्ता में सुधार और उपभोक्ता शिकायत निवारण प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को दूरसंचार क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कानूनी मील का पत्थर माना जा रहा है। इससे न केवल स्पेक्ट्रम के स्वामित्व को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई है, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों के प्रबंधन में सरकार की भूमिका को भी मजबूती मिली है। आने वाले समय में यह निर्णय टेलीकॉम कंपनियों, बैंकों और नियामकों के बीच संबंधों की दिशा तय करने में अहम साबित हो सकता है।






























