मणिकर्णिका पर बुलडोजर नहीं चले तो बेहतर, विरासत मिटाना विकास नहीं पाप है प्रियंका गांधी का सरकार पर तीखा हमला

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वाराणसी. काशी की आत्मा माने जाने वाले मणिकर्णिका घाट पर चल रहे ध्वस्तीकरण को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस कार्रवाई को शहरी विकास नहीं बल्कि “गंभीर पाप” करार देते हुए केंद्र और राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने कहा कि जिस मणिकर्णिका घाट ने सदियों से काशी की धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा है, वहां बुलडोजर चलाना प्रगति का प्रतीक नहीं, बल्कि इतिहास और आस्था पर सीधा प्रहार है.

प्रियंका गांधी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि मणिकर्णिका घाट पर चल रहे बुलडोजर मलबा नहीं हटा रहे, बल्कि उस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को तोड़ रहे हैं, जिसे लोकमाता अहिल्याबाई होलकर जैसी महान हस्तियों ने संवारा था. उन्होंने आरोप लगाया कि विकास के नाम पर सरकारें काशी की आत्मा को बाजार में बदलने की कोशिश कर रही हैं और धार्मिक स्थलों को व्यावसायिक हितों के हवाले किया जा रहा है.

कांग्रेस महासचिव ने कहा कि बनारस के मणिकर्णिका घाट से जुड़ी परंपराएं केवल आस्था का विषय नहीं हैं, बल्कि यह भारत की जीवित सभ्यता का प्रतीक हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की तथाकथित ‘पुनर्विकास’ परियोजनाएं दरअसल कुछ लोगों के व्यावसायिक हितों को साधने का जरिया बन गई हैं, जिनके लिए सदियों पुरानी मंदिर संरचनाएं और सांस्कृतिक धरोहरें कुर्बान की जा रही हैं. प्रियंका गांधी ने यह भी कहा कि इससे पहले भी बनारस में कई प्राचीन मंदिरों को नवीनीकरण के नाम पर ध्वस्त किया जा चुका है, जो बेहद चिंताजनक है.

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प्रियंका गांधी ने सरकार से मांग की कि काशी की धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को मिटाने की इन साजिशों को तत्काल रोका जाए. उन्होंने कहा कि विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि हम अपने इतिहास और आस्था को ही नष्ट कर दें. अगर ऐसा हुआ तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी.

सरकार की ओर से मणिकर्णिका घाट के पुनर्विकास को लेकर यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे श्रद्धालुओं और अंतिम संस्कार के लिए आने वाले लोगों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी. प्रशासन के मुताबिक, इस परियोजना का उद्देश्य मणिकर्णिका घाट से लेकर सिंधिया घाट तक के क्षेत्र को चौड़ा और सुव्यवस्थित करना है, ताकि भीड़ प्रबंधन आसान हो और सुविधाएं बेहतर बन सकें. इस परियोजना की आधारशिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 जुलाई 2023 को रखी थी और इसकी अनुमानित लागत करीब 17.56 करोड़ रुपये बताई गई है.

प्रशासन का दावा है कि नए मणिकर्णिका घाट में रैंप, बैठने की बेहतर व्यवस्था, दर्शन स्थल, छत पर वीआईपी बैठने की सुविधा और अन्य बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाएंगी. इसके अलावा घाट पर एक वुड प्लाजा भी बनाया जाना प्रस्तावित है, जहां अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी की व्यवस्था की जाएगी. सरकार का कहना है कि इन बदलावों से श्रद्धालुओं और शोकाकुल परिवारों को सुविधा मिलेगी और घाट की व्यवस्था आधुनिक जरूरतों के अनुरूप होगी.

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हालांकि, इन दावों के बीच प्रियंका गांधी और विपक्ष का कहना है कि सुविधाओं के नाम पर जिस तरह ऐतिहासिक ढांचे और प्राचीन मंदिरों को हटाया जा रहा है, वह काशी की मूल आत्मा के खिलाफ है. मणिकर्णिका घाट को ‘महाश्मशान’ कहा जाता है और यह दुनिया का एकमात्र ऐसा श्मशान है, जहां 24 घंटे चिताएं जलती रहती हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, काशी में मृत्यु होने पर स्वयं भगवान शिव मृतक के कान में तारक मंत्र का उपदेश देते हैं, जिससे उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसी कारण देश-विदेश से लोग अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार यहां कराने आते हैं.

प्रियंका गांधी ने कहा कि मणिकर्णिका घाट केवल एक स्थान नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है. इसे आधुनिक ढांचे में ढालने के नाम पर उसकी ऐतिहासिक पहचान को मिटाना न सिर्फ गलत है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक विरासत के साथ अपराध है. उन्होंने यह भी कहा कि विकास की कोई भी योजना स्थानीय परंपराओं, धार्मिक भावनाओं और ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखे बिना नहीं बनाई जानी चाहिए.

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इस मुद्दे पर स्थानीय स्तर पर भी नाराजगी देखी जा रही है. कई साधु-संत, पुरोहित और स्थानीय नागरिकों ने भी चिंता जताई है कि घाट की पारंपरिक संरचना को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. उनका कहना है कि मणिकर्णिका घाट की संकरी गलियां, प्राचीन मंदिर और पारंपरिक व्यवस्थाएं ही उसकी पहचान हैं, जिन्हें हटाकर काशी को एक सामान्य पर्यटन स्थल में बदलने की कोशिश हो रही है.

मणिकर्णिका घाट के पुनर्विकास को लेकर अब यह मुद्दा केवल शहरी योजना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक टकराव का बड़ा विषय बनता जा रहा है. प्रियंका गांधी के बयान के बाद यह बहस और तेज हो गई है कि विकास और विरासत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. फिलहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस आलोचना पर क्या रुख अपनाती है और क्या काशी की इस सबसे पवित्र धरोहर को लेकर कोई पुनर्विचार किया जाता है या नहीं.

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