ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में मोरपंख को अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली माना गया है. मान्यता है कि मोरपंख केवल भगवान श्रीकृष्ण के श्रृंगार का हिस्सा भर नहीं है, बल्कि यह सभी नौ ग्रहों का प्रतिनिधि भी है. धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि मोर के पंखों में देवी-देवताओं का वास होता है और यही कारण है कि इसे घर में रखना शुभ माना जाता है. इन दिनों सोशल और धार्मिक मंचों पर मोरपंख से जुड़े विभिन्न उपायों को लेकर चर्चा तेज हो गई है और लोग इसे जीवन की समस्याओं से मुक्ति का सरल माध्यम मान रहे हैं.
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण अपने मुकुट में मोरपंख धारण करते थे, जिससे यह प्रतीकात्मक रूप से प्रेम, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का द्योतक बन गया. ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि मोरपंख विशेष रूप से राहु-केतु से संबंधित दोषों को शांत करने में सहायक माना जाता है. जिन लोगों की कुंडली में राहु की स्थिति अशुभ होती है या कालसर्प योग बनता है, उन्हें मोरपंख अपने पास रखने या विशेष विधि से स्थापित करने की सलाह दी जाती है. मान्यता है कि इससे नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं और शुभ ग्रहों का असर बढ़ने लगता है.
पौराणिक कथाओं में भी मोर का विशेष स्थान बताया गया है. कहा जाता है कि प्राचीन काल में देवताओं ने एक असुर का वध मोर के माध्यम से किया था. पक्षी शास्त्र में मोर और गरुड़ दोनों के पंखों को शुभ और शक्तिशाली माना गया है. यही वजह है कि मंदिरों और पूजा स्थलों पर मोरपंख का प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है.
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार यदि घर में अचानक संकट या विपत्ति का सामना करना पड़ रहा हो तो शयनकक्ष या घर के अग्नि कोण में मोरपंख लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. धन-वैभव में वृद्धि की कामना रखने वाले लोगों के लिए भी विशेष उपाय बताए जाते हैं. श्रद्धापूर्वक किसी मंदिर में श्रीराधा-कृष्ण के मुकुट में मोरपंख स्थापित कर चालीस दिन बाद उसे घर की तिजोरी में रखने से आर्थिक स्थिति में सुधार होने की बात कही जाती है. हालांकि इन दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है, फिर भी आस्था के स्तर पर लोग इसे अपनाते हैं.
आयुर्वेद में भी मोरपंख का उल्लेख मिलता है. पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसे कुछ गंभीर रोगों के उपचार में सहायक माना गया है. तपेदिक, दमा, लकवा और अन्य जटिल रोगों में इसके उपयोग का वर्णन मिलता है, हालांकि आधुनिक चिकित्सा विशेषज्ञ किसी भी रोग के उपचार के लिए प्रमाणित चिकित्सा पद्धति अपनाने की सलाह देते हैं. धार्मिक विश्वास और चिकित्सा उपचार को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता बताई जाती है.
परिवार और बच्चों से जुड़े उपायों में भी मोरपंख का उल्लेख मिलता है. मान्यता है कि यदि बच्चा अत्यधिक जिद्दी हो रहा हो तो उसे मोरपंख से बने पंखे से हवा करने या कमरे में मोरपंख लगाने से स्वभाव में सकारात्मक परिवर्तन आता है. नवजात शिशु के सिरहाने चांदी के ताबीज में मोरपंख रखने से नजर दोष से रक्षा होने की बात कही जाती है. इसी तरह यदि कोई व्यक्ति शत्रुता से परेशान हो तो मंगलवार या शनिवार को विशेष विधि से मोरपंख पर नाम लिखकर बहते जल में प्रवाहित करने का उपाय बताया जाता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे उपाय लोगों को मानसिक संबल और सकारात्मक सोच प्रदान करते हैं. आस्था व्यक्ति के मनोबल को मजबूत करती है, जिससे वह समस्याओं का सामना अधिक आत्मविश्वास के साथ कर पाता है. हालांकि किसी भी प्रकार के ज्योतिषीय उपाय को अपनाने से पहले संतुलित दृष्टिकोण रखना आवश्यक है.
फिलहाल धार्मिक समुदायों और श्रद्धालुओं के बीच मोरपंख को लेकर आस्था और विश्वास का वातावरण बना हुआ है. लोग इसे अपने घरों में स्थापित कर सुख-समृद्धि और शांति की कामना कर रहे हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मोरपंख जीवन के अमंगल को दूर कर मंगलमय वातावरण बनाने का प्रतीक है, और यही विश्वास इसे आज भी विशेष बनाता है.






























