देश के विभिन्न हिस्सों तक 23 फरवरी से 2 अप्रैल के बीच बनने वाली कथित ग्रह स्थितियों, पंचग्रही योग, अंगारक दोष और सूर्य-चंद्र ग्रहण को लेकर सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा देखी जा रही है। कई संदेशों और पोस्ट में इसे “विस्फोटक योग” बताया जा रहा है, वहीं ज्योतिषीय प्रभावों को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। हालांकि खगोल विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि इस अवधि में यदि सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण जैसी घटनाएँ होती हैं तो वे पूर्णतः प्राकृतिक और नियमित खगोलीय घटनाएँ हैं, जिनका किसी विशेष राशि या व्यक्ति पर स्वतः नकारात्मक प्रभाव पड़ना वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है।
भारतीय खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार ग्रहण तब होता है जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में आ जाते हैं। सूर्य ग्रहण अमावस्या के समय और चंद्र ग्रहण पूर्णिमा के समय घटित होता है। यह प्रक्रिया हजारों वर्षों से चली आ रही है और भविष्य में भी जारी रहेगी। वैज्ञानिक समुदाय का कहना है कि ग्रहण का संबंध प्रकाश और छाया की स्थिति से है, न कि व्यक्तिगत भाग्य या किसी विशेष राशि के लिए संकट से। खगोलविदों के मुताबिक ग्रहण का समय, अवधि और दृश्यता पहले से गणना योग्य होती है और यह पूरी तरह पूर्वानुमेय खगोलीय गणित पर आधारित होती है।
सोशल मीडिया पर प्रसारित संदेशों में यह भी दावा किया जा रहा है कि 23 फरवरी से 2 अप्रैल के बीच बनने वाले ग्रह योग विशेष रूप से कुछ राशियों के लिए जोखिम भरे हो सकते हैं। इस पर विशेषज्ञों का कहना है कि राशियों के आधार पर सामूहिक भय उत्पन्न करना उचित नहीं है। ज्योतिष एक परंपरागत मान्यता प्रणाली है, जिसकी अपनी व्याख्याएँ हैं, लेकिन आधुनिक विज्ञान के अनुसार ग्रहों की स्थिति से किसी व्यक्ति की दुर्घटना, बीमारी या आर्थिक हानि का प्रत्यक्ष और निश्चित संबंध स्थापित नहीं हुआ है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी से करोड़ों किलोमीटर दूर स्थित ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति मानव जीवन पर उस प्रकार का प्रभाव नहीं डालती, जैसा कि भय पैदा करने वाले संदेशों में प्रस्तुत किया जाता है।
विज्ञान संचारकों का मानना है कि ग्रहण के दौरान कुछ सावधानियां अवश्य अपनाई जानी चाहिए, जैसे कि सूर्य ग्रहण को सीधे नंगी आँखों से न देखना, प्रमाणित सोलर फिल्टर का उपयोग करना और बच्चों को सुरक्षित तरीके से अवलोकन कराना। लेकिन यह सावधानी स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए है, न कि किसी दैविक संकट से बचने के लिए। इसी प्रकार चंद्र ग्रहण को देखने में कोई शारीरिक खतरा नहीं होता और इसे सामान्य रूप से देखा जा सकता है।
मनोवैज्ञानिकों ने भी इस तरह के संदेशों पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि जब किसी अवधि को “खतरनाक”, “विस्फोटक” या “डबल एक्टिवेशन” जैसे शब्दों से जोड़ा जाता है तो लोगों में अनावश्यक तनाव और चिंता पैदा हो सकती है। कई लोग महत्वपूर्ण निर्णय टाल देते हैं, यात्राएँ रद्द कर देते हैं या आर्थिक गतिविधियाँ रोक देते हैं, जबकि उनके पास ऐसा करने का कोई ठोस कारण नहीं होता। विशेषज्ञों का सुझाव है कि किसी भी निर्णय को तार्किक विश्लेषण, व्यक्तिगत परिस्थिति और उपलब्ध जानकारी के आधार पर लेना चाहिए।
ज्योतिष के जानकारों का एक वर्ग भी यह मानता है कि ग्रहयोग को समझने का अर्थ डर पैदा करना नहीं है। उनके अनुसार यदि कोई व्यक्ति इस अवधि को आत्मचिंतन, अनुशासन और संयम का समय मानता है तो यह सकारात्मक दृष्टिकोण हो सकता है। क्रोध पर नियंत्रण, अनावश्यक विवाद से बचना, स्वास्थ्य पर ध्यान देना और वित्तीय निर्णय सोच-समझकर लेना — ये सुझाव किसी भी समय प्रासंगिक होते हैं और इन्हें किसी विशेष भय से जोड़ना आवश्यक नहीं है।
अंतरिक्ष विज्ञान के अध्येताओं का कहना है कि भारत जैसे देश में, जहाँ अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन नियमित रूप से उपग्रह प्रक्षेपण और ग्रहों के अध्ययन में अग्रणी भूमिका निभा रहा है, वहाँ खगोलीय घटनाओं को वैज्ञानिक नजरिए से देखने की आवश्यकता और भी अधिक है। ग्रहण जैसी घटनाएँ बच्चों और युवाओं के लिए विज्ञान को समझने का अवसर भी हो सकती हैं। कई शैक्षणिक संस्थान इन अवसरों पर विशेष अवलोकन कार्यक्रम आयोजित करते हैं, ताकि छात्र प्रत्यक्ष अनुभव के माध्यम से खगोल विज्ञान को समझ सकें।
आर्थिक विशेषज्ञों का भी मानना है कि निवेश, व्यापार या यात्रा जैसे निर्णयों को केवल ग्रह योग से जोड़ना व्यावहारिक नहीं है। बाजार की स्थिति, व्यक्तिगत वित्तीय योजना, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे कारक कहीं अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। यदि कोई व्यक्ति सिर्फ भय के कारण योजनाएं टाल देता है तो वह संभावित अवसरों से वंचित भी हो सकता है।
इस बीच प्रशासन और वैज्ञानिक संस्थानों ने नागरिकों से अपील की है कि वे अप्रमाणित संदेशों पर तुरंत विश्वास न करें और विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी प्राप्त करें। इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में अफवाहें तेजी से फैलती हैं, लेकिन जागरूक नागरिकता का दायित्व है कि तथ्यों की जांच कर ही निष्कर्ष निकाले जाएँ।
विशेषज्ञों की राय में 23 फरवरी से 2 अप्रैल के बीच यदि ग्रहों की कुछ विशेष स्थितियाँ बनती हैं और सूर्य या चंद्र ग्रहण होते हैं, तो उन्हें प्रकृति की सामान्य प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए। यह अवधि डरने की नहीं, बल्कि समझने और सीखने की है। खगोलीय घटनाएँ मानव जिज्ञासा को बढ़ाती हैं, विज्ञान को आगे ले जाती हैं और हमें ब्रह्मांड की विशालता का एहसास कराती हैं। व्यक्तिगत जीवन में संतुलन, सावधानी और सकारात्मक सोच ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।इस प्रकार विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि यह समय “डराने वाला नहीं, समझने वाला योग” है। विवेकपूर्ण दृष्टिकोण, वैज्ञानिक समझ और संतुलित निर्णय ही नागरिकों के लिए सबसे उपयुक्त मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।





















