कविता- रक्त और अमृत

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– डॉ. अशोक कुमार वर्मा

लाल कणिकाएँ रक्त की शिराओं में बहती जाएँ,
साँसों की डोरी से जुड़कर हृदय को नित्य धड़काएँ।
जीवन की हर स्पंदन में इनका ही संगीत समाया,
न दिन देखे न रात प्राणवायु को मस्तिष्क तक पहुँचाया।    

न जात किसी की जाने, न धर्म का अलाप बजाएँ,
न भाषा का भेद समझें, न कोई सीमा अपनाएँ।
नित्य नियमित बहे शिरा में शांत, सरल, निष्काम,
मानवता की सेवा ही जिनका एकमात्र धाम।

कभी-कभी अनायास ही जब रक्त की कमी हो जाए,
टूटती साँसों की डोरी को रक्तदान की सोच बचाए।
एक थैली रक्त की, जैसे अमृत का संचार,
किसी अनजाने के जीवन में भर दे फिर से बहार।

आओ हम सब मिलकर एक सौगंध खाएँ,
रक्त के अभाव से न किसी के प्राण जाएँ।
ऊँच-नीच और जात-पात से ऊपर उठाकर,
हम मानवता की ज्योत जगाएँ।

एक रक्त, एक देश, एक धड़कन का संदेश,
हम सब मिलकर प्रेम का रचें नया परिवेश।
जब एक बूंद किसी की जीवन-रेखा बन जाती हैं,
तब समझो सच्ची पूजा प्रभु चरणों में बस जाती हैं। 

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