नई दिल्ली. दुनिया की बड़ी घटनाएं अक्सर दूर कहीं घटती नजर आती हैं, लेकिन उनका असर चुपचाप आम जीवन तक पहुंच जाता है. पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और खासकर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में संभावित जोखिम ने अब भारत की कृषि व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं. एक हालिया रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि इस समुद्री मार्ग में किसी भी प्रकार का व्यवधान भारत की उर्वरक आपूर्ति और लागत पर सीधा असर डाल सकता है, जिससे अंततः देश की खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है.
रिपोर्ट के मुताबिक भारत की उर्वरक प्रणाली, विशेष रूप से यूरिया उत्पादन, बड़े पैमाने पर आयातित प्राकृतिक गैस पर निर्भर है. यह गैस मुख्य रूप से उन्हीं क्षेत्रों से आती है जहां इस समय राजनीतिक और सैन्य तनाव चरम पर है. ऐसे में यदि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में आवाजाही प्रभावित होती है, तो वैश्विक गैस आपूर्ति बाधित हो सकती है और कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है. इसका सीधा असर भारत में उर्वरक उत्पादन की लागत पर पड़ेगा, जिससे कृषि क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ेगी.
यह संकट केवल उद्योग या ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है. जब उर्वरकों की लागत बढ़ती है, तो इसका बोझ अंततः किसानों पर आता है. किसान पहले से ही बढ़ती लागत, अनिश्चित मौसम और बाजार के दबाव से जूझ रहे हैं. ऐसे में उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि उनकी उत्पादन क्षमता को प्रभावित कर सकती है. इसका असर फसलों की पैदावार पर पड़ेगा और अंततः खाद्य कीमतों में वृद्धि के रूप में सामने आएगा, जिससे आम उपभोक्ता भी प्रभावित होंगे.
स्थिति को और जटिल बनाता है भारत का उर्वरकों पर भारी सब्सिडी खर्च. सरकार पहले से ही किसानों को राहत देने के लिए बड़ी मात्रा में सब्सिडी दे रही है. यदि गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो यह वित्तीय बोझ और बढ़ जाएगा. इस दोहरे दबाव—आयात निर्भरता और बढ़ती सब्सिडी—से पूरी प्रणाली की स्थिरता पर सवाल उठने लगे हैं.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में उर्वरकों का उपयोग संतुलित नहीं है. खासकर नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है. इससे दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. यानी वर्तमान मॉडल न केवल आर्थिक रूप से अस्थिर है, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी टिकाऊ नहीं है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या केवल आपूर्ति श्रृंखला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नीतिगत और संरचनात्मक मुद्दा भी है. कृषि प्रणाली लंबे समय से फॉसिल फ्यूल आधारित इनपुट्स पर निर्भर रही है, जिसे लगातार सब्सिडी के माध्यम से प्रोत्साहित किया गया है. अब यही निर्भरता एक कमजोरी बनकर सामने आ रही है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस संकट की गूंज सुनाई दे रही है. कई देशों के किसान बढ़ती उर्वरक कीमतों और आपूर्ति अनिश्चितता के कारण चिंतित हैं. अफ्रीका और एशिया के किसानों के सामने समान चुनौतियां हैं—बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन और बाजार का दबाव. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते विकल्पों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह संकट और गहरा सकता है.
कृषि विशेषज्ञ और संगठनों का मानना है कि समाधान मौजूद हैं, लेकिन उन्हें प्राथमिकता देने की जरूरत है. जैविक उर्वरकों और बायो-फर्टिलाइजर का उपयोग बढ़ाना, फसल चक्र अपनाना, और मिट्टी की सेहत पर ध्यान देना ऐसे कदम हैं जो इस निर्भरता को कम कर सकते हैं. साथ ही, कृषि सब्सिडी की संरचना में बदलाव कर उसे टिकाऊ और स्थानीय विकल्पों की ओर मोड़ा जा सकता है.
कुछ किसान अब आत्मनिर्भर खेती की ओर बढ़ रहे हैं, जहां बाहरी इनपुट्स पर निर्भरता कम की जाती है. यह मॉडल न केवल लागत को नियंत्रित करता है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहतर माना जाता है. हालांकि, इस दिशा में व्यापक बदलाव के लिए नीतिगत समर्थन और निवेश की आवश्यकता होगी.
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में जारी तनाव भले ही अस्थायी हो, लेकिन इसने एक स्थायी सवाल खड़ा कर दिया है. क्या वैश्विक खाद्य प्रणाली अत्यधिक बाहरी संसाधनों पर निर्भर हो चुकी है? और यदि हां, तो क्या यह मॉडल भविष्य के झटकों को सहन कर पाएगा?
यह संकट केवल ऊर्जा का नहीं है. यह खेतों, किसानों और हर उस थाली का सवाल है, जो इस व्यवस्था पर निर्भर है. यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में ऐसे झटके और अधिक गंभीर रूप ले सकते हैं.


























