नई दिल्ली। तिब्बत को लेकर चीन की आधिकारिक कहानी एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। बीजिंग लगातार यह दावा करता रहा है कि तिब्बत प्राचीन काल से चीन का अभिन्न हिस्सा रहा है और 1950 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का प्रवेश ‘मुक्ति अभियान’ था। हालांकि अनेक इतिहासकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता और निर्वासित तिब्बती समुदाय इस दावे को ऐतिहासिक पुनर्लेखन करार देते हैं और इसे राजनीतिक वैधता स्थापित करने का प्रयास मानते हैं।
चीन का तर्क मुख्यतः युआन और छिंग वंशों के दौर से जुड़ा है। आधिकारिक दृष्टिकोण के अनुसार 13वीं शताब्दी के युआन शासनकाल से तिब्बत चीन की संप्रभुता के अधीन रहा। लेकिन कई विद्वान इस व्याख्या पर प्रश्न उठाते हैं। उनका कहना है कि युआन साम्राज्य मंगोलों का व्यापक साम्राज्य था, जिसने चीन और तिब्बत दोनों पर अलग-अलग प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित किया था। ऐसे में उस कालखंड को आधुनिक राष्ट्र-राज्य की संप्रभुता की अवधारणा से जोड़ना ऐतिहासिक संदर्भों का सरलीकरण माना जाता है।
इतिहासकार यह भी इंगित करते हैं कि तिब्बती धार्मिक नेतृत्व और मंगोल या मंचू शासकों के बीच संबंध ‘आध्यात्मिक संरक्षक और आश्रयदाता’ के रूप में अधिक थे, न कि आधुनिक अर्थों में शासक और प्रजा के रूप में। 1911 में छिंग शासन के पतन से लेकर 1950 तक तिब्बत ने व्यावहारिक रूप से स्वशासन किया। उस अवधि में वहां अपनी मुद्रा, डाक व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचा संचालित होता रहा। बीजिंग इस दौर को ‘अस्थायी अलगाव’ बताता है, जबकि आलोचक इसे प्रभावी स्वायत्त शासन की अवधि मानते हैं।
1951 का सत्रह सूत्रीय समझौता तिब्बत पर चीन के नियंत्रण का औपचारिक आधार बना। चीनी पक्ष इसे शांतिपूर्ण एकीकरण की संधि बताता है, जबकि निर्वासित तिब्बती नेतृत्व और कुछ शोधकर्ता इसे दबाव में हस्ताक्षरित असमान समझौता कहते हैं। 1959 में तिब्बत में व्यापक विद्रोह हुआ और दलाई लामा भारत आ गए। बीजिंग इसे ‘प्रतिगामी तत्वों का विद्रोह’ कहता है, पर आलोचकों के अनुसार यह विदेशी नियंत्रण के विरुद्ध असंतोष की अभिव्यक्ति थी।
वर्तमान समय में बहस केवल इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक और भाषाई प्रश्नों तक विस्तारित हो चुकी है। तिब्बती भाषा की जगह मंदारिन को विद्यालयों में प्राथमिक माध्यम बनाने की नीति, मठों की गतिविधियों पर निगरानी और धार्मिक संस्थानों में प्रशासनिक हस्तक्षेप जैसे मुद्दे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में सामने आते रहे हैं। चीन का तर्क है कि ये कदम राष्ट्रीय एकता, विकास और सामाजिक स्थिरता के लिए आवश्यक हैं। आलोचक इसे सांस्कृतिक समरूपीकरण की प्रक्रिया बताते हैं।
दलाई लामा के उत्तराधिकार को लेकर भी विवाद गहराया हुआ है। बीजिंग ने स्पष्ट किया है कि अगली मान्यता प्राप्त पुनर्जन्म प्रक्रिया पर उसका अधिकार होगा, जबकि तिब्बती निर्वासित समुदाय इसे धार्मिक परंपरा में सरकारी हस्तक्षेप मानता है। इस मुद्दे ने वैश्विक स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों पर नई बहस छेड़ दी है।
सूचना और पहुंच को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। विदेशी पत्रकारों और राजनयिकों की तिब्बत यात्राएं प्रायः नियंत्रित और सीमित दायरे में होती हैं। चीन इसे सुरक्षा और प्रशासनिक आवश्यकता बताता है, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे स्वतंत्र आकलन कठिन हो जाता है। दूसरी ओर, चीन तिब्बत में बुनियादी ढांचे, सड़क, रेल और ऊर्जा परियोजनाओं को विकास के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है। बीजिंग का दावा है कि जीवन स्तर में सुधार हुआ है और गरीबी में उल्लेखनीय कमी आई है।
विश्लेषकों के अनुसार तिब्बत का प्रश्न केवल ऐतिहासिक दावे का विवाद नहीं, बल्कि संप्रभुता, सांस्कृतिक पहचान और आत्मनिर्णय के अधिकार से जुड़ा जटिल मुद्दा है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय एकीकरण और विकास का उदाहरण मानता है, तो दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक नियंत्रण और सांस्कृतिक क्षरण के रूप में देखता है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह विषय समय-समय पर उठता रहा है, लेकिन वैश्विक राजनीति, आर्थिक हितों और सामरिक समीकरणों के कारण ठोस हस्तक्षेप सीमित ही रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि तिब्बत पर विमर्श को भावनात्मक या प्रचारात्मक भाषा से हटाकर ऐतिहासिक दस्तावेजों, मानवाधिकार मानकों और स्थानीय समुदायों की वास्तविक आवाज के आधार पर परखा जाना चाहिए।
तिब्बत को लेकर चीन का आधिकारिक आख्यान और उसके आलोचकों की दलीलें—दोनों ही वैश्विक बहस का हिस्सा हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इतिहास, विकास और सांस्कृतिक अधिकारों के बीच संतुलन किस दिशा में आकार लेता है।






























