नई दिल्ली. दिल्ली और ब्रुसेल्स के बीच 18 साल लंबी तकरार के बाद भारत और यूरोपीय संघ ने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर आखिरकार मुहर लगा दी है। यह सिर्फ टैरिफ कटौती या बाजार खोलने की साधारण डील नहीं, बल्कि व्यापार और जलवायु नीतियों को एक साथ बुनने वाली नई वैश्विक साझेदारी का ऐतिहासिक मोड़ है। दुनिया जब जियो-इकॉनॉमिक तनाव, कार्बन टैक्स, सप्लाई चेन की अस्थिरता और ऊर्जा संकट से जूझ रही है, तब यह समझौता दोनों पक्षों के लिए रणनीतिक लंगर साबित हो रहा है। अमेरिका की टैरिफ जंग, यूरोप का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) और वैश्विक बाजारों की अनिश्चितता ने देशों को मजबूर किया है कि वे नए सहयोगी तलाशें। इसी दौर में भारत-EU FTA उभरकर एक क्लाइमेट-ट्रेड कन्वर्जेंस प्लेटफॉर्म बन गया है, जो न सिर्फ आर्थिक बल्कि पर्यावरणीय स्थिरता का वादा करता है।
क्लाइमेट ट्रेंड्स की फाउंडर-डायरेक्टर आरती खोसला इसे वैश्विक शक्ति संतुलन के बदलाव से जोड़ती हैं। वे कहती हैं, “जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता चरम पर है। यूरोपीय संघ स्थापित शक्ति है, भारत उभरती ताकत। जलवायु लक्ष्य, ग्रीन इंडस्ट्री और क्लीन टेक पर इनका गठजोड़ साफ बता रहा है कि पूंजी और बाजार किस दिशा में बह रहे हैं। यह डील भरोसा जगाती है और मल्टीलेट्रलिज्म को नई रणनीतिक जमीन देती है।” आर्थिक नजरिए से देखें तो यह समझौता विशालकाय है। वर्तमान में भारत-EU द्विपक्षीय व्यापार करीब 124 अरब यूरो का है, जो आने वाले वर्षों में दोगुना होने का अनुमान है। 90 फीसदी से ज्यादा वस्तुओं पर टैरिफ घटाने या हटाने से दोनों देशों को सालाना अरबों यूरो की बचत होगी। लेकिन आंकड़ों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण इसकी ग्रीन संरचना है, जो जलवायु को महज फुटनोट नहीं बल्कि पूरा फ्रेमवर्क बना देती है।
इस FTA की जान यह है कि जलवायु को अलग अध्याय की तरह नहीं, बल्कि सौदे का रणनीतिक आधार बनाया गया है। पहले से चली आ रही भारत-EU क्लीन एनर्जी एंड क्लाइमेट पार्टनरशिप रिन्यूएबल एनर्जी, एनर्जी एफिशिएंसी और ग्रीन हाइड्रोजन पर सहयोग का मजबूत ढांचा तैयार कर चुकी है। नया व्यापार समझौता इसे आर्थिक और नीतिगत ताकत देता है। ग्रीन हाइड्रोजन इस साझेदारी का सेंट्रल पिलर बन चुका है। भारत की 2030 तक इलेक्ट्रोलाइजर क्षमता बढ़ाने और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन की महत्वाकांक्षा यूरोप की डीकार्बोनाइजेशन जरूरतों से सीधे जुड़ रही है। यह केवल ऊर्जा संक्रमण नहीं, बल्कि नई औद्योगिक भूगोल रचने की कहानी है। E3G की एशिया प्रोग्राम लीड मधुरा जोशी बताती हैं, “EU भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है। इस लंबे समय से अटके FTA का पूरा होना ऐतिहासिक है। यह साझेदारी व्यापार से आगे बढ़कर साफ ऊर्जा उद्योग बनाने पर केंद्रित है, बिना किसी एक देश या सप्लाई चेन पर निर्भर हुए। पूरकता साफ दिखती है, अवसर विशाल हैं और समय बिल्कुल सही।”
क्लीन टेक को आधार बनाकर यह गठबंधन न केवल भारत-यूरोप बल्कि वैश्विक क्लीन एनर्जी सप्लाई चेन में लचीलापन ला सकता है। लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं। EU का CBAM भारतीय उद्योगों के लिए बड़ा खतरा है। पूरी तरह लागू होने पर भारतीय निर्यातकों पर सालाना अरबों डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। इसी दबाव ने नई बातचीत को जन्म दिया है। भारत के उभरते कार्बन मार्केट और EU स्टैंडर्ड्स के बीच मॉनिटरिंग, रिपोर्टिंग और वेरिफिकेशन सिस्टम पर तालमेल की चर्चा तेज हो गई है। यह टकराव कम, ट्रांजिशन की राजनीति ज्यादा लगती है। निवेश के मोर्चे पर यूरोपीय निवेश बैंक भारत में क्लाइमेट-रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बड़े निवेश का संकेत दे चुका है। कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) जैसे प्लेटफॉर्म आपदा जोखिम, इंफ्रा सुरक्षा और जलवायु लचीलापन को सीधे फाइनेंस से जोड़ रहे हैं। इससे साफ है कि यह साझेदारी व्यापारिक से कूदकर क्लाइमेट सिक्योरिटी मॉडल की ओर बढ़ रही है।
बड़ी तस्वीर में यह FTA वैश्विक शक्ति संतुलन के बदलते दौर का प्रतीक है। भारत उभरती ताकत, यूरोप स्थापित शक्ति—इनका मिलन बाजार विस्तार से आगे एक नए मल्टीपोलर ऑर्डर में स्थिरता की खोज है। जहां पहले व्यापार सिर्फ विकास का जरिया था, अब वह जलवायु जिम्मेदारी और रणनीतिक भरोसे की भाषा बोलता है। भारत-EU FTA यही नई जलवायु कहानी रच रहा है, जहां व्यापार, ऊर्जा और पर्यावरण अलग फाइलें नहीं, एक ही फोल्डर में समाहित हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल द्विपक्षीय व्यापार बढ़ेगा बल्कि ग्लोबल ग्रीन इकोनॉमी को नई दिशा मिलेगी। भारत के ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को यूरोपीय बाजारों की ताकत मिलेगी, जबकि यूरोप को विश्वसनीय सप्लाई चेन। कुल मिलाकर, यह डील भविष्य की अर्थव्यवस्था का ब्लूप्रिंट है, जो जलवायु संकट के बीच आर्थिक विकास को संभव बनाती है।



























