तेजी से भागते ग्रह बिगाड़ रहे हैं जीवन की रफ्तार, फैसलों में बढ़ी जल्दबाजी और धैर्य की भारी कमी

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वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में यदि लोगों को यह महसूस हो रहा है कि समय तेजी से फिसल रहा है, फैसले जल्दबाजी में लिए जा रहे हैं और समाज में धैर्य लगातार कम होता जा रहा है, तो इसके पीछे ज्योतिषीय दृष्टि से एक बड़ा कारण सामने आ रहा है. वर्ष 2025-2026 से लेकर 2032 तक का समय एक विशेष ग्रह स्थिति से गुजर रहा है, जिसमें देवगुरु बृहस्पति सहित कई प्रमुख ग्रह ‘अतिचारी’ अवस्था में गोचर कर रहे हैं. ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यही ग्रहों की असामान्य तेजी आज की वैश्विक मानसिक अस्थिरता, सामाजिक अफरातफरी और निर्णयों में अधीरता की मूल वजह बन रही है.

ज्योतिष शास्त्र में ‘अतिचारी’ शब्द का अर्थ है सामान्य गति से कहीं अधिक तेजी से चलने वाला ग्रह. जब कोई ग्रह अपनी औसत चाल को छोड़कर किसी राशि को तय समय से पहले पार कर लेता है, तो उसे अतिचारी कहा जाता है. यह स्थिति सूर्य और चंद्रमा में नहीं आती, क्योंकि उनकी गति नियत मानी जाती है, वहीं राहु और केतु सदैव वक्री होने के कारण इस श्रेणी में नहीं आते. मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि जैसे तारा ग्रह ही अतिचारी हो सकते हैं और सूर्य से एक विशेष दूरी पर आने पर उनकी गति असाधारण रूप से बढ़ जाती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अतिचारी ग्रहों का प्रभाव केवल व्यक्तिगत कुंडली तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर सामूहिक चेतना और वैश्विक घटनाक्रमों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. वर्तमान समय में जब बृहस्पति जैसा भारी और जीवन से जुड़े मूल तत्वों का कारक ग्रह अतिचारी हो, तो उसका प्रभाव समाज के हर स्तर पर महसूस होना स्वाभाविक है. बृहस्पति को धर्म, कानून, अर्थव्यवस्था, ज्ञान और जीवन का कारक माना जाता है. इसकी तेज चाल का अर्थ है कि ये सभी क्षेत्र गहराई और स्थिरता के बजाय जल्दबाजी और अस्थिरता की ओर बढ़ रहे हैं.

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आज लोगों को यह लगने लगा है कि समय सिमट गया है. जो घटनाएं पहले वर्षों में घटित होती थीं, वे अब महीनों में सामने आ रही हैं. सरकारें तेजी से नीतियां बना और बदल रही हैं, अंतरराष्ट्रीय समझौते जल्दबाजी में हो रहे हैं और उतनी ही जल्दी टूट भी जा रहे हैं. आर्थिक मोर्चे पर भी इसका असर दिख रहा है, जहां शेयर बाजार और रियल एस्टेट में अचानक उछाल देखने को मिल रहा है, लेकिन वह मजबूत आधार के बिना होने के कारण बुलबुले जैसा साबित हो रहा है. विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह उछाल जितनी तेजी से आता है, उतनी ही तेजी से फूट भी सकता है.

अतिचारी ग्रहों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी गहरा माना जाता है. ज्योतिषाचार्यों के अनुसार अतिचारी ग्रह उस व्यक्ति की तरह होता है जो भीतर से डरा हुआ है या जिसे कहीं पहुंचने की जल्दी है. वह जिस क्षेत्र को प्रभावित करता है, वहां गहराई से काम करने के बजाय सतही परिणाम देकर आगे बढ़ जाना चाहता है. इसी कारण ऐसे ग्रहों से मिलने वाले फल अक्सर स्थायी नहीं होते. अचानक धन लाभ होना और उतनी ही तेजी से खर्च हो जाना, अचानक रिश्ते बनना और बिना परिपक्वता के टूट जाना, या फिर जल्दबाजी में लिया गया करियर निर्णय—ये सभी अतिचारी ग्रहों के सामान्य संकेत माने जाते हैं.

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व्यक्तिगत जीवन में भी इन ग्रहों के प्रभाव साफ नजर आते हैं. अतिचारी बृहस्पति के प्रभाव में व्यक्ति गहन अध्ययन या दीर्घकालिक योजना के बजाय त्वरित समाधान और शॉर्टकट की ओर आकर्षित होता है. गंभीर विषयों को समझने के लिए समय देने के बजाय लोग सारांश, क्रैश कोर्स और त्वरित ज्ञान पर निर्भर होने लगते हैं. विवाह, संतान, नौकरी या व्यवसाय से जुड़े फैसले भी आवेग में लिए जाते हैं, जिनके परिणाम बाद में चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं.

अतिचारी बुध वाणी और विचारों की गति में असंतुलन पैदा करता है. व्यक्ति बोलने में तेज हो जाता है, लेकिन सुनने की क्षमता घट जाती है. इसके चलते दस्तावेजों, अनुबंधों और व्यावसायिक सौदों में छोटी-छोटी शर्तें नजरअंदाज हो जाती हैं, जिससे धोखे और विवाद की संभावना बढ़ जाती है. वहीं अतिचारी मंगल धैर्य को लगभग समाप्त कर देता है. सड़क पर आक्रामक व्यवहार, जल्दबाजी में निर्णय और जोखिम भरे कदम इसी का परिणाम माने जाते हैं, जो दुर्घटनाओं और टकराव की आशंका बढ़ाते हैं.

शनि जब अतिचारी होता है तो मेहनत और धैर्य के सिद्धांत को चुनौती देता है. व्यक्ति लंबी प्रक्रिया से गुजरने के बजाय जुगाड़ और शॉर्टकट से सफलता पाने की कोशिश करता है. इसका नतीजा यह होता है कि करियर में अस्थिरता बढ़ जाती है और लोग बिना ठोस योजना या बैकअप के बड़े फैसले ले लेते हैं, जो बाद में पछतावे का कारण बनते हैं.

हालांकि ज्योतिषाचार्य यह भी स्पष्ट करते हैं कि अतिचारी ग्रह हमेशा नकारात्मक फल ही दें, ऐसा नहीं है. फलित ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण नियम के अनुसार यदि शुभ भावों के स्वामी ग्रह अतिचारी हों तो उनके फल कमजोर और अस्थिर हो सकते हैं, जबकि छठे, आठवें और बारहवें जैसे अशुभ भावों के स्वामी ग्रह यदि अतिचारी हों तो यह राहत देने वाला संकेत माना जाता है. ऐसी स्थिति में रोग, शत्रु, कर्ज या संकट आते तो हैं, लेकिन टिकते नहीं और व्यक्ति को जल्दी राहत मिल जाती है.

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कुल मिलाकर विशेषज्ञों का मानना है कि अतिचारी ग्रहों का यह दौर मानवता को एक महत्वपूर्ण संदेश दे रहा है. यह समय सिखाता है कि गति ही सफलता की गारंटी नहीं है. जब ग्रह भाग रहे हों, तब मनुष्य को और अधिक ठहराव, सोच-विचार और सावधानी की आवश्यकता होती है. दस्तावेजों को दोबारा जांचना, बड़े फैसलों में जल्दबाजी से बचना और भीड़ के साथ भागने के बजाय अपने विवेक पर भरोसा करना ही इस कालखंड का सबसे बड़ा उपाय माना जा रहा है. ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस समय का एकमात्र प्रभावी समाधान धैर्य ही बताया जा रहा है, क्योंकि वही अतिचारी समय में स्थिरता का सबसे मजबूत आधार बन सकता है.

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