सिरसिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में मंगलवार को प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) के तहत एक स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर में कुल 205 गर्भवती महिलाओं की चिकित्सीय जांच, इलाज और परामर्श दिया गया। जांच के दौरान, 33 गर्भवती महिलाओं को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में चिन्हित किया गया, जिन्हें विशेष निगरानी और उपचार की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, 40 गर्भवती महिलाओं में खून की कमी (एनीमिया) पाई गई, जिसके लिए उन्हें आयरन सुक्रोज की खुराक दी गई। सीएचसी के अधीक्षक डॉ. शैलेंद्र मणि ओझा ने बताया कि उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था में मां और शिशु दोनों के लिए खतरा बना रहता है। उन्होंने समझाया कि गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप, मधुमेह, गंभीर एनीमिया, भ्रूण का बड़ा होना, या प्लेसेंटा का विकृत या नीचे होना जैसी स्थितियां गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकती हैं। डॉ. ओझा ने जोर देकर कहा कि उच्च जोखिम वाले खतरों की शुरुआती पहचान के लिए गर्भावस्था के दौरान नियमित सोनोग्राफी, चिकित्सीय परामर्श और इलाज अत्यंत आवश्यक है। समय पर चिकित्सीय प्रबंधन शुरू करने से मां और बच्चे दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि उच्च जोखिम के लक्षण पाए जाने पर गर्भवती को कम से कम तीन बार विशेषज्ञ चिकित्सीय सलाह लेना अनिवार्य होता है। इस शिविर को सफल बनाने में डॉ. पीएन पटेल, डॉ. अनवरू दीन, ज्योति, प्रेम कुमार त्रिपाठी, अजय कुमार पांडेय, रुपम पाठक, सविता मौर्या, अर्चना चौधरी, रेखा पांडेय, कृष्ण गोपाल पांडेय, रविंद्र कुमार और अश्वनी अग्रहरि सहित कई स्वास्थ्यकर्मी शामिल रहे।
सिरसिया सीएचसी में पीएमएसएमए शिविर का आयोजन:205 गर्भवती महिलाओं की हुई जांच, 33 गर्भवती महिलाएं हाई-रिस्क श्रेणी में चिन्हित
सिरसिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में मंगलवार को प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) के तहत एक स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर में कुल 205 गर्भवती महिलाओं की चिकित्सीय जांच, इलाज और परामर्श दिया गया। जांच के दौरान, 33 गर्भवती महिलाओं को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में चिन्हित किया गया, जिन्हें विशेष निगरानी और उपचार की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, 40 गर्भवती महिलाओं में खून की कमी (एनीमिया) पाई गई, जिसके लिए उन्हें आयरन सुक्रोज की खुराक दी गई। सीएचसी के अधीक्षक डॉ. शैलेंद्र मणि ओझा ने बताया कि उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था में मां और शिशु दोनों के लिए खतरा बना रहता है। उन्होंने समझाया कि गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप, मधुमेह, गंभीर एनीमिया, भ्रूण का बड़ा होना, या प्लेसेंटा का विकृत या नीचे होना जैसी स्थितियां गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकती हैं। डॉ. ओझा ने जोर देकर कहा कि उच्च जोखिम वाले खतरों की शुरुआती पहचान के लिए गर्भावस्था के दौरान नियमित सोनोग्राफी, चिकित्सीय परामर्श और इलाज अत्यंत आवश्यक है। समय पर चिकित्सीय प्रबंधन शुरू करने से मां और बच्चे दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि उच्च जोखिम के लक्षण पाए जाने पर गर्भवती को कम से कम तीन बार विशेषज्ञ चिकित्सीय सलाह लेना अनिवार्य होता है। इस शिविर को सफल बनाने में डॉ. पीएन पटेल, डॉ. अनवरू दीन, ज्योति, प्रेम कुमार त्रिपाठी, अजय कुमार पांडेय, रुपम पाठक, सविता मौर्या, अर्चना चौधरी, रेखा पांडेय, कृष्ण गोपाल पांडेय, रविंद्र कुमार और अश्वनी अग्रहरि सहित कई स्वास्थ्यकर्मी शामिल रहे।









































