बलरामपुर जिले के सीमावर्ती क्षेत्र में लगभग 14 स्थानों पर भूजल स्वतः ही लगातार बाहर निकल रहा है। विकासखंड गैसड़ी की ग्राम पंचायत रनियापुर पहाड़ापुर के रामलीला मैदान में हैंडपंप से तेज दबाव के साथ पानी बह रहा है। इसी तरह सुगानगर डुमरी गांव में भी बोरिंग से असीमित जल का प्रवाह जारी है। थारू जनजाति के गांव सोनगढ़ा, मुतेहरा और अकलघरवा के प्रधान विश्राम थारू ने बताया कि उनके क्षेत्र में परिषदीय विद्यालय, पंचायत सचिवालय, पानी टंकी, बीएसएनएल टावर और एसएसबी कैंप सहित दस अन्य जगहों पर भी पानी स्वतः निकल रहा है। स्थानीय महिलाएं और बच्चे इन जलस्रोतों के पास कपड़े धोते और नहाते हैं, जबकि छोटे किसान पाइप के माध्यम से खेतों की सिंचाई करते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यह पानी शुद्ध है और इसके सेवन से कुछ रोग ठीक हो जाते हैं। सीमा क्षेत्र स्थित बसंत लाल विद्यालय के अध्यक्ष विवेक गोयल, जिनकी भूगर्भ विज्ञान में रुचि है, ने इस घटना का वैज्ञानिक कारण बताया। उनके अनुसार, यह आर्टिजियन एक्वीफर्स (भूजल भृत) नामक वैज्ञानिक प्रक्रिया के कारण होता है। यह जलचक्र का हिस्सा है, जहां पानी ढलान की ओर बहता है। जमीन के नीचे पानी का दबाव अधिक होने के कारण गुरुत्वाकर्षण और प्राकृतिक दबाव से यह पाइप के सहारे बाहर निकलने लगता है। गोयल ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह स्वतः बहकर बर्बाद हो रहे जल का संरक्षण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जहां-जहां ऐसे जलस्रोत हैं, उनके आसपास हमेशा पानी भरा रहता है, जिन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए। इससे जल का संचयन होगा और बेकार जल बहाव को रोका जा सकेगा।
बलरामपुर में 14 जगहों पर स्वतः निकल रहा भूजल:वैज्ञानिक प्रक्रिया से पानी का रिसाव, संरक्षण की मांग
बलरामपुर जिले के सीमावर्ती क्षेत्र में लगभग 14 स्थानों पर भूजल स्वतः ही लगातार बाहर निकल रहा है। विकासखंड गैसड़ी की ग्राम पंचायत रनियापुर पहाड़ापुर के रामलीला मैदान में हैंडपंप से तेज दबाव के साथ पानी बह रहा है। इसी तरह सुगानगर डुमरी गांव में भी बोरिंग से असीमित जल का प्रवाह जारी है। थारू जनजाति के गांव सोनगढ़ा, मुतेहरा और अकलघरवा के प्रधान विश्राम थारू ने बताया कि उनके क्षेत्र में परिषदीय विद्यालय, पंचायत सचिवालय, पानी टंकी, बीएसएनएल टावर और एसएसबी कैंप सहित दस अन्य जगहों पर भी पानी स्वतः निकल रहा है। स्थानीय महिलाएं और बच्चे इन जलस्रोतों के पास कपड़े धोते और नहाते हैं, जबकि छोटे किसान पाइप के माध्यम से खेतों की सिंचाई करते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यह पानी शुद्ध है और इसके सेवन से कुछ रोग ठीक हो जाते हैं। सीमा क्षेत्र स्थित बसंत लाल विद्यालय के अध्यक्ष विवेक गोयल, जिनकी भूगर्भ विज्ञान में रुचि है, ने इस घटना का वैज्ञानिक कारण बताया। उनके अनुसार, यह आर्टिजियन एक्वीफर्स (भूजल भृत) नामक वैज्ञानिक प्रक्रिया के कारण होता है। यह जलचक्र का हिस्सा है, जहां पानी ढलान की ओर बहता है। जमीन के नीचे पानी का दबाव अधिक होने के कारण गुरुत्वाकर्षण और प्राकृतिक दबाव से यह पाइप के सहारे बाहर निकलने लगता है। गोयल ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह स्वतः बहकर बर्बाद हो रहे जल का संरक्षण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जहां-जहां ऐसे जलस्रोत हैं, उनके आसपास हमेशा पानी भरा रहता है, जिन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए। इससे जल का संचयन होगा और बेकार जल बहाव को रोका जा सकेगा।









































