महराजगंज के फरेन्दा जंगल क्षेत्र में किसान जंगली जानवरों और आवारा पशुओं से परेशान हैं। 12 फरवरी 2026 को मिली जानकारी के अनुसार, फरेन्दा जंगल के किनारे बसे दर्जनों गांवों के किसान अपनी फसलों की रखवाली के लिए दिन-रात संघर्ष कर रहे हैं। रात के अंधेरे में जंगली जानवरों और आवारा पशुओं के झुंड जंगल से निकलकर खेतों में घुस जाते हैं। वे खड़ी फसल को चरने के साथ-साथ पैरों तले रौंदकर भारी नुकसान पहुंचाते हैं। कड़ाके की ठंड और कोहरे के बावजूद किसान खेतों में झोपड़ियां और मचान बनाकर पहरा देने को विवश हैं। किसानों का कहना है कि सरकार की ओर से कोई ठोस योजना न होने के कारण उनकी मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। गोपलापुर, अलहदिया, सेमराडाड़ी, मथुरानगर, परगापुर, लेदवा, जमुहराखुर्द और गुदरीपुर जैसे गांवों के किसानों ने दैनिक भास्कर को अपनी व्यथा बताई। गोपलापुर के प्रह्लाद ने कहा कि रात के समय हिरण, सूअर और नीलगाय के झुंड खेतों पर हमला कर देते हैं। मशालें जलाने और ढोल बजाने के बावजूद नुकसान होता है। अलहदिया के मुन्नीलाल ने बताया कि शीतलहर में मचान पर बैठे-बैठे हड्डियां अकड़ जाती हैं और सुबह तक खेत का एक बड़ा हिस्सा रौंदा हुआ मिलता है। सेमराडाड़ी के शंकर ने बताया कि पिछले हफ्ते उनकी गेहूं की 30 प्रतिशत फसल सूअरों ने बर्बाद कर दी। किसान दिनभर खेत जोतते हैं और रातभर पहरा देते हैं। परिवार के पुरुष सदस्य ही खेतों में डेरा डाले रहते हैं। मथुरानगर के जगदीश ने कहा कि आवारा पशु भी कम नहीं हैं, वे दिन में भी खेतों में घुस आते हैं। बिजली के तार लगाने की योजना बनी थी, लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ। परगापुर के स्वामीनाथ ने बताया कि वन विभाग ने कभी जाल या ट्रैप नहीं लगाए और निगरानी के लिए कैमरे भी नहीं हैं। लेदवा के राधेश्याम ने अफसोस जताते हुए कहा कि सोलर फेंसिंग या ड्रोन निगरानी जैसी सरकारी योजनाएं दूसरे जिलों में चल रही हैं, लेकिन यहां केवल कागजों में हैं। किसानों की मांग है कि सरकार वन क्षेत्र को संरक्षित करे ताकि जंगली जानवर जंगल से बाहर न आ सकें और उन्हें रातभर रखवाली न करनी पड़े।
महराजगंज में जंगली जानवरों से फसलें बर्बाद: किसान रातभर खेतों की रखवाली को मजबूर, सरकार से मदद की आस – Pharenda News
महराजगंज के फरेन्दा जंगल क्षेत्र में किसान जंगली जानवरों और आवारा पशुओं से परेशान हैं। 12 फरवरी 2026 को मिली जानकारी के अनुसार, फरेन्दा जंगल के किनारे बसे दर्जनों गांवों के किसान अपनी फसलों की रखवाली के लिए दिन-रात संघर्ष कर रहे हैं। रात के अंधेरे में जंगली जानवरों और आवारा पशुओं के झुंड जंगल से निकलकर खेतों में घुस जाते हैं। वे खड़ी फसल को चरने के साथ-साथ पैरों तले रौंदकर भारी नुकसान पहुंचाते हैं। कड़ाके की ठंड और कोहरे के बावजूद किसान खेतों में झोपड़ियां और मचान बनाकर पहरा देने को विवश हैं। किसानों का कहना है कि सरकार की ओर से कोई ठोस योजना न होने के कारण उनकी मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। गोपलापुर, अलहदिया, सेमराडाड़ी, मथुरानगर, परगापुर, लेदवा, जमुहराखुर्द और गुदरीपुर जैसे गांवों के किसानों ने दैनिक भास्कर को अपनी व्यथा बताई। गोपलापुर के प्रह्लाद ने कहा कि रात के समय हिरण, सूअर और नीलगाय के झुंड खेतों पर हमला कर देते हैं। मशालें जलाने और ढोल बजाने के बावजूद नुकसान होता है। अलहदिया के मुन्नीलाल ने बताया कि शीतलहर में मचान पर बैठे-बैठे हड्डियां अकड़ जाती हैं और सुबह तक खेत का एक बड़ा हिस्सा रौंदा हुआ मिलता है। सेमराडाड़ी के शंकर ने बताया कि पिछले हफ्ते उनकी गेहूं की 30 प्रतिशत फसल सूअरों ने बर्बाद कर दी। किसान दिनभर खेत जोतते हैं और रातभर पहरा देते हैं। परिवार के पुरुष सदस्य ही खेतों में डेरा डाले रहते हैं। मथुरानगर के जगदीश ने कहा कि आवारा पशु भी कम नहीं हैं, वे दिन में भी खेतों में घुस आते हैं। बिजली के तार लगाने की योजना बनी थी, लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ। परगापुर के स्वामीनाथ ने बताया कि वन विभाग ने कभी जाल या ट्रैप नहीं लगाए और निगरानी के लिए कैमरे भी नहीं हैं। लेदवा के राधेश्याम ने अफसोस जताते हुए कहा कि सोलर फेंसिंग या ड्रोन निगरानी जैसी सरकारी योजनाएं दूसरे जिलों में चल रही हैं, लेकिन यहां केवल कागजों में हैं। किसानों की मांग है कि सरकार वन क्षेत्र को संरक्षित करे ताकि जंगली जानवर जंगल से बाहर न आ सकें और उन्हें रातभर रखवाली न करनी पड़े।











































