विकास खंड परतावल के पिपरपाती तिवारी में श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन किया जा रहा है। इस कथा के व्यास प्रसिद्ध कथावाचक बालेंदु शेखर शुक्ल जी महाराज हैं। उन्होंने कथा सुनाते हुए श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित पूतना उद्धार के प्रसंग का विस्तृत वर्णन किया। कथावाचक ने बताया कि पूतना उद्धार की कथा आरोप्य नाश की कथा है। मथुरा का अत्याचारी राजा कंस जब यह सुनता है कि देवकी का आठवाँ पुत्र ही उसके वध का कारण बनेगा, तो वह भयभीत हो जाता है। कंस ने गोकुल में जन्मे शिशुओं की हत्या के लिए अनेक राक्षसों को भेजा था, जिनमें से एक भयंकर राक्षसी पूतना थी। पूतना रूप बदलने में निपुण थी। एक दिन उसने अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण कर गोकुल में प्रवेश किया। उसके चेहरे पर ममता का मुखौटा था, लेकिन हृदय में घोर विष भरा हुआ था। गोकुल की सरल गोपियाँ उसकी मायावी छवि से मोहित हो गईं। पूतना सीधे नंदभवन पहुँची, जहाँ नन्हे कृष्ण शैया पर लेटे थे। उसने अपने स्तनों पर विष लगाकर बालक कृष्ण को गोद में उठा लिया, ताकि दूध के साथ ही वह प्राणहर विष भी पिला दे। परंतु जैसे ही पूतना ने बालक कृष्ण को स्तनपान कराया, श्रीकृष्ण ने केवल दूध ही नहीं, उसके प्राण भी खींच लिए। पीड़ा से व्याकुल होकर पूतना अपने असली विशाल राक्षसी रूप में प्रकट हुई और धरती पर गिर पड़ी। उसका विशाल शरीर पर्वत के समान फैला हुआ था, और नन्हे कृष्ण उसके वक्ष पर खेल रहे थे। कथा के दौरान बताया गया कि जिसने विष देने का प्रयास किया, उसे भी प्रभु ने मोक्ष प्रदान किया। इसका कारण यह था कि पूतना ने छलपूर्वक ही सही, मातृत्व का भाव धारण किया था। भगवान ने उस क्षणिक मातृभाव को स्वीकार कर उसे अपने धाम में स्थान दिया। इस अवसर पर यजमान ध्यानेश्वर मणि त्रिपाठी और उषा मणि त्रिपाठी सहित वीरेंद्र मणि, आचार्य जगन्नाथ पाण्डेय, आचार्य अर्जुन शुक्ल, आचार्य पवन तिवारी, राजू शुक्ला, चंद्रभूषण मणि त्रिपाठी, नरेंद्र कुमार, संजय मणि त्रिपाठी, महेंद्र मणि त्रिपाठी, नंदलाल यादव और शिव शंकर शुक्ला आदि उपस्थित रहे।
पिपरपाती तिवारी में भागवत कथा का आयोजन: कथावाचक बालेंदु शेखर शुक्ल ने सुनाया पूतना उद्धार प्रसंग – Chhapaiya(Maharajganj sadar) News
विकास खंड परतावल के पिपरपाती तिवारी में श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन किया जा रहा है। इस कथा के व्यास प्रसिद्ध कथावाचक बालेंदु शेखर शुक्ल जी महाराज हैं। उन्होंने कथा सुनाते हुए श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित पूतना उद्धार के प्रसंग का विस्तृत वर्णन किया। कथावाचक ने बताया कि पूतना उद्धार की कथा आरोप्य नाश की कथा है। मथुरा का अत्याचारी राजा कंस जब यह सुनता है कि देवकी का आठवाँ पुत्र ही उसके वध का कारण बनेगा, तो वह भयभीत हो जाता है। कंस ने गोकुल में जन्मे शिशुओं की हत्या के लिए अनेक राक्षसों को भेजा था, जिनमें से एक भयंकर राक्षसी पूतना थी। पूतना रूप बदलने में निपुण थी। एक दिन उसने अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण कर गोकुल में प्रवेश किया। उसके चेहरे पर ममता का मुखौटा था, लेकिन हृदय में घोर विष भरा हुआ था। गोकुल की सरल गोपियाँ उसकी मायावी छवि से मोहित हो गईं। पूतना सीधे नंदभवन पहुँची, जहाँ नन्हे कृष्ण शैया पर लेटे थे। उसने अपने स्तनों पर विष लगाकर बालक कृष्ण को गोद में उठा लिया, ताकि दूध के साथ ही वह प्राणहर विष भी पिला दे। परंतु जैसे ही पूतना ने बालक कृष्ण को स्तनपान कराया, श्रीकृष्ण ने केवल दूध ही नहीं, उसके प्राण भी खींच लिए। पीड़ा से व्याकुल होकर पूतना अपने असली विशाल राक्षसी रूप में प्रकट हुई और धरती पर गिर पड़ी। उसका विशाल शरीर पर्वत के समान फैला हुआ था, और नन्हे कृष्ण उसके वक्ष पर खेल रहे थे। कथा के दौरान बताया गया कि जिसने विष देने का प्रयास किया, उसे भी प्रभु ने मोक्ष प्रदान किया। इसका कारण यह था कि पूतना ने छलपूर्वक ही सही, मातृत्व का भाव धारण किया था। भगवान ने उस क्षणिक मातृभाव को स्वीकार कर उसे अपने धाम में स्थान दिया। इस अवसर पर यजमान ध्यानेश्वर मणि त्रिपाठी और उषा मणि त्रिपाठी सहित वीरेंद्र मणि, आचार्य जगन्नाथ पाण्डेय, आचार्य अर्जुन शुक्ल, आचार्य पवन तिवारी, राजू शुक्ला, चंद्रभूषण मणि त्रिपाठी, नरेंद्र कुमार, संजय मणि त्रिपाठी, महेंद्र मणि त्रिपाठी, नंदलाल यादव और शिव शंकर शुक्ला आदि उपस्थित रहे।






























