प्राणायाम से अज्ञान, मानसिक दोष नष्ट होते:बस्ती में योगाचार्य बोले- जीवन में ज्ञान का प्रकाश आता है

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बस्ती में पतंजलि योग पीठ हरिद्वार (यूनिट बस्ती) के योगाचार्य डॉ. नवीन सिंह ने कहा है कि प्राणायाम के नियमित अभ्यास से अज्ञान और मानसिक दोष नष्ट होते हैं, जिससे जीवन में ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है। उन्होंने बताया कि योग के अष्टांग मार्ग में प्राणायाम को चौथा महत्वपूर्ण अंग माना गया है। डॉ. सिंह के अनुसार, प्राणायाम ‘प्राण’ और ‘आयाम’ शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है श्वास-प्रश्वास की नियंत्रित प्रक्रिया। यह न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है, बल्कि मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक उन्नति का भी प्रभावी साधन है। डॉ. सिंह ने वेदों और ब्राह्मण ग्रंथों का उल्लेख करते हुए बताया कि प्राण को वायु के रूप में वर्णित किया गया है। उनके अनुसार, प्राण एवं अपान वायु के संतुलन और संयम को ही प्राणायाम कहते हैं। उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार भट्टी में तपाने से धातुओं के मल नष्ट हो जाते हैं, उसी तरह नियमित प्राणायाम अभ्यास से इंद्रियों और मन के दोष समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने योगदर्शन में वर्णित पांच क्लेशों—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—का जिक्र किया। डॉ. सिंह ने बताया कि प्राणायाम के नियमित अभ्यास से ये क्लेश क्षीण हो जाते हैं। महर्षि पतंजलि के योगसूत्र ‘ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्’ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि प्राणायाम से ज्ञान पर पड़ा अज्ञान का आवरण नष्ट होता है, जिससे विवेक और वैराग्य का उदय होता है। डॉ. सिंह ने महर्षि पतंजलि द्वारा बताए गए प्राणायाम के चार प्रकारों—बाह्य, आभ्यंतर, स्तम्भवृत्ति और बाह्याभ्यंतर विषयाक्षेपी—के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने अभ्यास के लिए सर्वोत्तम समय और स्थान भी बताया। उनके अनुसार, प्राणायाम का अभ्यास प्रातःकाल खाली पेट, शौच के बाद, शुद्ध और हवादार स्थान पर करना चाहिए। ढीले वस्त्र पहनकर, नासिका से श्वास लेते-छोड़ते हुए व्यक्ति को अपनी आयु और शारीरिक क्षमता के अनुसार ही अभ्यास करना चाहिए। डॉ. नवीन सिंह ने यह भी बताया कि प्राणायाम के दौरान ईश्वर का ध्यान करने या ओम् और गायत्री मंत्र का जप करने से विशेष लाभ होता है। उन्होंने आम जनता से अपील की कि वे प्राणायाम को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएं, ताकि स्वस्थ, संतुलित और आध्यात्मिक जीवन जी सकें।

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