निचलौल। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र निचलौल में बुधवार को आशा कार्यकर्ताओं के लिए दिव्यांगता की शीघ्र पहचान विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह प्रशिक्षण बाल सशक्तिकरण कार्यक्रम के अंतर्गत जन विकास समिति, वाराणसी और पूर्वांचल ग्रामीण सेवा समिति द्वारा संचालित आई.डी.सी.सी.वाई.डी. कार्यक्रम के तहत हुआ। इसमें कुल 40 आशा कार्यकर्ता और अन्य स्वास्थ्य कर्मी मौजूद रहे। कार्यक्रम में जिला समन्वयक बालमुकुंद पाण्डेय ने आशा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बताया कि 0 से 6 वर्ष की आयु बच्चों के समग्र विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने जोर दिया कि यदि इस अवधि में किसी भी प्रकार की शारीरिक, मानसिक, भाषाई या सामाजिक विकास में देरी की पहचान समय रहते कर ली जाए, तो सुधार की संभावना काफी बढ़ जाती है। पाण्डेय ने कहा कि दिव्यांगता की शीघ्र पहचान अत्यंत आवश्यक है। इससे बच्चों को समय पर उचित उपचार, थेरेपी और पुनर्वास सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं, जिससे गंभीर दिव्यांगता की स्थिति को रोका जा सके। प्रशिक्षण के दौरान 0 से 12 माह तक के बच्चों में होने वाले शारीरिक, भाषाई और मानसिक विकास के विभिन्न चरणों की विस्तृत जानकारी दी गई। आशा कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया गया कि वे अपने कार्यक्षेत्र में किसी भी बच्चे में विकास संबंधी विलंब या असामान्यता दिखने पर उसे तत्काल नजदीकी सरकारी अस्पताल में रेफर करें। इस अवसर पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र निचलौल के बीसीपीएम परमेश्वर शाही तथा पीजीएसएस से शिवकुमार एवं मुंजेश कुमार पटेल भी उपस्थित रहे।
निचलौल में आशा कार्यकर्ताओं का दिव्यांगता पहचान प्रशिक्षण आयोजित: 6 वर्ष तक की आयु को बाल विकास के लिए बताया गया सबसे महत्वपूर्ण – Bahuar(Nichlaul) News
निचलौल। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र निचलौल में बुधवार को आशा कार्यकर्ताओं के लिए दिव्यांगता की शीघ्र पहचान विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह प्रशिक्षण बाल सशक्तिकरण कार्यक्रम के अंतर्गत जन विकास समिति, वाराणसी और पूर्वांचल ग्रामीण सेवा समिति द्वारा संचालित आई.डी.सी.सी.वाई.डी. कार्यक्रम के तहत हुआ। इसमें कुल 40 आशा कार्यकर्ता और अन्य स्वास्थ्य कर्मी मौजूद रहे। कार्यक्रम में जिला समन्वयक बालमुकुंद पाण्डेय ने आशा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बताया कि 0 से 6 वर्ष की आयु बच्चों के समग्र विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने जोर दिया कि यदि इस अवधि में किसी भी प्रकार की शारीरिक, मानसिक, भाषाई या सामाजिक विकास में देरी की पहचान समय रहते कर ली जाए, तो सुधार की संभावना काफी बढ़ जाती है। पाण्डेय ने कहा कि दिव्यांगता की शीघ्र पहचान अत्यंत आवश्यक है। इससे बच्चों को समय पर उचित उपचार, थेरेपी और पुनर्वास सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं, जिससे गंभीर दिव्यांगता की स्थिति को रोका जा सके। प्रशिक्षण के दौरान 0 से 12 माह तक के बच्चों में होने वाले शारीरिक, भाषाई और मानसिक विकास के विभिन्न चरणों की विस्तृत जानकारी दी गई। आशा कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया गया कि वे अपने कार्यक्षेत्र में किसी भी बच्चे में विकास संबंधी विलंब या असामान्यता दिखने पर उसे तत्काल नजदीकी सरकारी अस्पताल में रेफर करें। इस अवसर पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र निचलौल के बीसीपीएम परमेश्वर शाही तथा पीजीएसएस से शिवकुमार एवं मुंजेश कुमार पटेल भी उपस्थित रहे।






































