गोरखपुर से 50 किलोमीटर उत्तर में, हिमालय की तराई में स्थित बृजमनगंज के पास, पवह नदी के तट पर प्रसिद्ध शक्तिपीठ माता आद्रवन वासिनी (लेहड़ा देवी) का मंदिर है। शारदीय नवरात्र के दौरान यह मंदिर लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है। इस शक्तिपीठ को ‘आद्रवन वासिनी’ नाम से पुकारे जाने का मुख्य कारण इसका आद्रवन में स्थित होना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय इसी आद्रवन में बिताया था। कहा जाता है कि पांडव पुत्र भीम यहां देवी मां की पिंडी में आराधना करते थे। मंदिर की ऐतिहासिकता छठवीं शताब्दी से भी जुड़ी है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 606 ई. से 647 ई. के मध्य अपनी भारत यात्रा के वृतांत में इस मंदिर का उल्लेख किया था। उस समय भारत में सम्राट हर्षवर्धन का शासन था। मंदिर से जुड़ी एक अन्य किवदंती के अनुसार, बहुत पहले पवह नदी में एक सुंदर कन्या नाव पर सवार होकर जा रही थी। उसकी सुंदरता देखकर नाविक की नीयत खराब हो गई। जब कन्या ने अपना असली देवी रूप दिखाया, तो नाव नाविक सहित डूबने लगी। नाविक ने देवी मां से क्षमा याचना की, तब दयालु मां दुर्गा ने कहा कि ‘तेरे ही कारण मैं इस नदी के तट पर अपनी छाया छोड़े जा रही हूं। भक्त मेरी पूजा के समय तुझे भी श्रद्धा से देखेंगे।’ मंदिर की पिंडी के उत्तर दिशा में नाव पर देवी और नाविक की प्रतिमा भी मौजूद है। प्रत्येक नवरात्र में पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित गोरखपुर और नेपाल जैसे दूरस्थ स्थानों से हजारों श्रद्धालु पैदल चलकर देवी दर्शन के लिए आते हैं। शक्तिपीठ के मुख्य पुजारी महन्थ श्री देवीदत्त पाण्डेय के उत्तराधिकारी संतोष कुमार पांडेय और उनका पूरा परिवार मंदिर की सेवा में लगा रहता है। सुबह-शाम मां की आरती और पूजा-पाठ इन्हीं के परिवार के सदस्यों द्वारा किया जाता है।
महराजगंज का शक्तिपीठ आद्रवन का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा: शारदीय नवरात्र में लाखों श्रद्धालु करते हैं दर्शन, आस्था का प्रमुख केंद्र बना – Maharajganj News
गोरखपुर से 50 किलोमीटर उत्तर में, हिमालय की तराई में स्थित बृजमनगंज के पास, पवह नदी के तट पर प्रसिद्ध शक्तिपीठ माता आद्रवन वासिनी (लेहड़ा देवी) का मंदिर है। शारदीय नवरात्र के दौरान यह मंदिर लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है। इस शक्तिपीठ को ‘आद्रवन वासिनी’ नाम से पुकारे जाने का मुख्य कारण इसका आद्रवन में स्थित होना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय इसी आद्रवन में बिताया था। कहा जाता है कि पांडव पुत्र भीम यहां देवी मां की पिंडी में आराधना करते थे। मंदिर की ऐतिहासिकता छठवीं शताब्दी से भी जुड़ी है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 606 ई. से 647 ई. के मध्य अपनी भारत यात्रा के वृतांत में इस मंदिर का उल्लेख किया था। उस समय भारत में सम्राट हर्षवर्धन का शासन था। मंदिर से जुड़ी एक अन्य किवदंती के अनुसार, बहुत पहले पवह नदी में एक सुंदर कन्या नाव पर सवार होकर जा रही थी। उसकी सुंदरता देखकर नाविक की नीयत खराब हो गई। जब कन्या ने अपना असली देवी रूप दिखाया, तो नाव नाविक सहित डूबने लगी। नाविक ने देवी मां से क्षमा याचना की, तब दयालु मां दुर्गा ने कहा कि ‘तेरे ही कारण मैं इस नदी के तट पर अपनी छाया छोड़े जा रही हूं। भक्त मेरी पूजा के समय तुझे भी श्रद्धा से देखेंगे।’ मंदिर की पिंडी के उत्तर दिशा में नाव पर देवी और नाविक की प्रतिमा भी मौजूद है। प्रत्येक नवरात्र में पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित गोरखपुर और नेपाल जैसे दूरस्थ स्थानों से हजारों श्रद्धालु पैदल चलकर देवी दर्शन के लिए आते हैं। शक्तिपीठ के मुख्य पुजारी महन्थ श्री देवीदत्त पाण्डेय के उत्तराधिकारी संतोष कुमार पांडेय और उनका पूरा परिवार मंदिर की सेवा में लगा रहता है। सुबह-शाम मां की आरती और पूजा-पाठ इन्हीं के परिवार के सदस्यों द्वारा किया जाता है।
































