सिद्धार्थनगर में मनरेगा नहीं, कागजी रोजगार का खेल:गडरखा से पूरे सिद्धार्थनगर तक फैला फर्जी हाजिरी नेटवर्क

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सिद्धार्थनगर में मनरेगा योजना अब रोजगार नहीं, बल्कि कागजी हाजिरी और तयशुदा भुगतान का मॉडल बन गई है। विकासखंड बढ़नी के ग्राम गडरखा में सामने आया मामला अब केवल एक गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे जिले में चल रहे मनरेगा भ्रष्टाचार की तस्वीर उजागर करता है। यहां एक ही कार्य पर पहले 222 और अब 137 मजदूरों की हाजिरी दिखाकर कागजी काम पूरे किए जा रहे हैं, जबकि जमीन पर न तो मजदूर दिखते हैं और न ही कोई कार्य हो रहा है। गडरखा की तस्वीर साफ बताती है कि मनरेगा का संचालन अब जमीनी जरूरतों पर नहीं, बल्कि फाइलों की सुविधा के हिसाब से किया जा रहा है। मास्टर रोल में रोज वही नाम, वही फोटो और वही कार्य विवरण दर्ज होता है। संख्या घटाकर यह दिखाने की कोशिश जरूर की जाती है कि सब कुछ नियम के अनुसार चल रहा है, लेकिन असलियत यह है कि पूरा खेल केवल आंकड़ों तक सीमित है। तकनीक भी बन गई भ्रष्टाचार की ढाल फोटो और जियो टैगिंग जैसी व्यवस्थाएं, जिन्हें भ्रष्टाचार रोकने के लिए हथियार बताया गया था, अब खुद भ्रष्टाचार की ढाल बनती दिख रही हैं। एक ही पृष्ठभूमि, एक ही समूह और एक ही मुद्रा अलग-अलग तारीखों पर अपलोड की जा रही है। यह तभी संभव है जब निगरानी केवल कागजों तक सीमित हो और जमीन पर सत्यापन जानबूझकर न किया जा रहा हो। डीसी मनरेगा की निष्क्रियता सवालों में जिले में मनरेगा की निगरानी डीसी मनरेगा के पास है। इसके बावजूद यदि एक ही मॉडल बार-बार सामने आता है और कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो यह निष्क्रियता नहीं बल्कि व्यवस्था के भीतर संरक्षण की ओर इशारा करती है। सवाल उठता है—क्या जिले स्तर पर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं? खंड विकास अधिकारी बढ़नी की चुप्पी गडरखा जिस विकासखंड में आता है, वहां के खंड विकास अधिकारी की भूमिका सबसे अधिक संदेह के घेरे में है। कार्यस्थल, मजदूरों की उपस्थिति और मास्टर रोल का मिलान करना उनकी जिम्मेदारी है। इसके बावजूद अगर कागजों में सैकड़ों मजदूर हैं और जमीन पर सन्नाटा है, तो यह लापरवाही नहीं बल्कि जिम्मेदारी से भागने का मामला है। मनरेगा लोकपाल प्रणाली केवल नाम की? मनरेगा लोकपाल की व्यवस्था अनियमितताओं पर अंकुश लगाने के लिए बनाई गई थी, लेकिन जिले में यह व्यवस्था लगभग अदृश्य नजर आती है। न तो स्वतंत्र भौतिक सत्यापन, न मजदूरों से संवाद और न ही सार्वजनिक रिपोर्ट उपलब्ध हैं। इससे सवाल उठता है कि क्या लोकपाल की भूमिका केवल कागजों तक सीमित कर दी गई या जानबूझकर निष्क्रिय रखी गई है। गडरखा से पूरे जिले में फैलता मॉडल सूत्रों और ग्रामीणों के अनुसार, गडरखा जैसा मॉडल जिले के कई अन्य गांवों में भी अपनाया जा रहा है। तय मजदूर, तय फोटो और तय मास्टर रोल—यह ऐसा ढांचा बन गया है जो पूरे सिद्धार्थनगर में धड़ल्ले से चल रहा है। कहीं संख्या 100 से ऊपर है, तो कहीं नाम पुराने हैं, लेकिन तरीका एक ही है। रोजगार योजना से फर्जी भुगतान की मशीन बनी मनरेगा मनरेगा, जो ग्रामीणों के सम्मान और रोजगार से जुड़ी योजना है, अब आंकड़ों और भुगतान की मशीन बनती जा रही है। यदि समय रहते डीसी मनरेगा, खंड विकास अधिकारी बढ़नी और मनरेगा लोकपाल की जवाबदेही तय नहीं हुई, तो यह साफ हो जाएगा कि जिले में मनरेगा भ्रष्टाचार अपवाद नहीं बल्कि व्यवस्था बन चुका है। सवाल अब सिर्फ गडरखा का नहीं आज सवाल केवल गडरखा का नहीं है। सवाल यह है कि सिद्धार्थनगर में मनरेगा किसके लिए चल रही है—मजदूरों के लिए या फर्जी मास्टर रोल के लिए। रिकॉर्ड बोल रहे हैं, लेकिन जमीन अब भी खामोश है।
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