
श्रावस्ती के ऐतिहासिक बौद्ध स्थल सहेट-महेट में श्रीलंका और थाईलैंड से आए बौद्ध श्रद्धालुओं ने भगवान बुद्ध की तपोस्थली पर पूजा-अर्चना की। इस दौरान ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ के उद्घोष से पूरा परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया। यह प्रतिनिधिमंडल अपनी बौद्ध तीर्थयात्रा के तहत श्रावस्ती पहुंचा था। भगवान गौतम बुद्ध ने अपने जीवन के कई वर्ष इसी स्थान पर व्यतीत किए थे। प्राचीन काल में श्रावस्ती नगरी के नाम से विख्यात सहेट-महेट बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए एक अत्यंत पवित्र स्थल है। यहां स्थित जेतवन विहार में भगवान बुद्ध ने अनेक वर्षावास किए थे। उन्होंने अपने उपदेशों से मानवता को करुणा, अहिंसा और मध्यम मार्ग का संदेश दिया। विदेशी श्रद्धालुओं ने प्राचीन स्तूपों और विहारों के अवशेषों के दर्शन किए। उन्होंने पुष्प अर्पित कर शांति पाठ किया। इस दौरान भिक्षुओं ने पारंपरिक बौद्ध मंत्रों का उच्चारण किया, जिससे वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया। श्रद्धालुओं ने ध्यान साधना कर विश्व शांति, करुणा और मानव कल्याण की कामना की। स्थानीय प्रशासन और पर्यटन विभाग के अधिकारियों ने आगंतुकों का स्वागत किया। उन्होंने श्रद्धालुओं को स्थल की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता के बारे में जानकारी दी। विदेशी मेहमानों ने श्रावस्ती की पावन भूमि पर पहुंचकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस किया। उन्होंने यहां की शांति और आध्यात्मिकता की सराहना की। उल्लेखनीय है कि श्रावस्ती बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। यहां प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। श्रीलंका और थाईलैंड के नागरिकों की इस यात्रा से श्रावस्ती की अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पहचान और सुदृढ़ हुई है। सहेट-महेट क्षेत्र में गूंजते ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ के स्वरों ने यह संदेश दिया कि भगवान बुद्ध की शिक्षाएं आज भी विश्व को शांति और सद्भाव का मार्ग दिखा रही हैं।







































