महुआ डाबर: 1857 क्रांति का उजाड़ा गया गांव:अब संग्रहालय में जीवित हुआ शहीदों का इतिहास

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बस्ती जिले के महुआ डाबर गाँव में 1857 की क्रांति का इतिहास एक संग्रहालय के रूप में फिर से जीवित हो उठा है। यह वही गाँव है जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने प्रतिशोध में पूरी तरह उजाड़ दिया था और ‘गैर-चिरागी’ घोषित कर दिया था। अब यह संग्रहालय उस अदम्य साहस और बलिदान की कहानी कहता है जिसने ब्रिटिश सत्ता की नींव हिला दी थी। क्रांति की यह चिंगारी 10 जून 1857 को मनोरमा नदी के तट पर भड़की थी। शहीद पिरई खां के नेतृत्व में महुआ डाबर और आसपास के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी अफसरों के खिलाफ विद्रोह किया। इस संघर्ष में छह अंग्रेज अधिकारी मारे गए थे। इस घटना से आक्रोशित तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर विलियम पेपे ने बदले की कार्रवाई करते हुए पूरे महुआ डाबर गाँव को ‘गैर-चिरागी’ (आबादी रहित) घोषित कर दिया था। अंग्रेजों ने गाँव के घरों को जला दिया, खेती-किसानी नष्ट कर दी और हजारों निर्दोष ग्रामीणों को मौत के घाट उतार दिया। इतिहासकार इस घटना को पूर्वांचल का ‘जलियांवाला बाग’ भी मानते हैं, जिसे जानबूझकर इतिहास के पन्नों से गायब करने का प्रयास किया गया। वर्ष 1999 में स्थापित महुआ डाबर संग्रहालय आज लगभग 5000 गुमनाम शहीदों की स्मृति को सहेजे हुए है। इसे राष्ट्रवाद की एक जीवंत पाठशाला के रूप में देखा जाता है। इस संग्रहालय में ब्रिटिश शासन के दुर्लभ दस्तावेज़ सुरक्षित हैं, जिनमें गाँव को नष्ट करने के फरमान दर्ज हैं। यहाँ शहीद पिरई खां और उनके साथियों के पारंपरिक हथियार जैसे किरच, भाला और ढाल भी प्रदर्शित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, खंडहरों से मिली लखौरी ईंटें और मस्जिद के अवशेष उस समृद्ध समाज की याद दिलाते हैं जिसे मिटाने का प्रयास किया गया था। इस विरासत को दुनिया के सामने लाने का श्रेय म्यूज़ियम के निदेशक डॉ. शाह आलम राना को जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन महुआ डाबर के शहीदों को पहचान दिलाने और दबे हुए इतिहास को सामने लाने में समर्पित कर दिया। डॉ. राना के इसी समर्पण को देखते हुए अमेरिका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी ने उन्हें डी.लिट (D.Litt) की मानद उपाधि से सम्मानित किया। जनमानस ने उन्हें सम्मानपूर्वक ‘जिंदा शहीद’ की संज्ञा दी है।

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