परसा तिवारी स्थित बुढ़िया समय माता मंदिर में चल रही कथा के 5वें दिन सोमवार को श्रीराम-सीता विवाह का प्रसंग सुनाया गया। कथावाचक डॉ. विष्णुकांत शुक्ल ने फुलवारी, नगर भ्रमण और विवाह की कथा का वर्णन किया, जिसे सुनकर श्रोता हर्षित हो उठे। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. विष्णुकांत शुक्ल ने अयोध्या से मिथिला तक बारात की यात्रा और मिथिला में बारात के आतिथ्य सत्कार पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि पूजा में भाव की महत्ता होती है, क्योंकि प्रभु भक्त के भाव को देखते हैं। यदि एक बार छवि मन में बस जाए, तो राम हर जगह दिखेंगे। कथावाचक ने बताया कि रामचरितमानस में विवाह का अलौकिक वर्णन है, जिसमें कुल चार प्रकार के विवाहों का उल्लेख है। पहला देव विवाह, जो शिव-पार्वती का था और ब्रह्म विवाह की विधि से संपन्न हुआ। दूसरा नर विवाह, जो श्रीराम-सीता का स्वयंवर विवाह था, लेकिन ऋषियों ने इसे ब्रह्म विवाह कराकर वैदिक परंपरा का पालन कराया। तीसरा ऋषि विवाह, देवर्षि नारद से संबंधित है। नारदजी मोहवश विवाह करना चाहते थे, लेकिन यह विवाह भंग हो गया। इससे यह शिक्षा मिलती है कि वासना और मोह से प्रेरित विवाह कष्टप्रद होता है। चौथा राक्षसी विवाह है, जो केवल भोग की भावना से प्रेरित होता है। वासना के कारण नाक-कान कटवाकर विवाह का विनाश हो जाता है। भारतीय सनातन पद्धति में विवाह का मुख्य उद्देश्य योग है, जिसमें स्त्री-पुरुष मिलकर अंतरस में योग साधना को सम्मिलित करते हैं। बिना मुहूर्त के होने वाला विवाह ‘मृत्यु विवाह’ या अशुभ विवाह कहलाता है, जो राक्षस बुद्धि की संतान का जन्मदाता होता है। श्रीराम-सीता विवाह से मानव समाज को विधि-विधान से ब्रह्म विवाह करने का सुझाव दिया गया है, जो सनातन धर्म का जनक और रक्षक है। विवाह के अवसर पर पटाखे फोड़े गए, और आयोजक आदर्श तिवारी व नीतीश पांडेय उर्फ मन्नू पंडित ने टॉफियों की बौछार की तथा मिठाइयां बांटीं। प्रसिद्ध भोजपुरी गीत गायक दिवाकर द्विवेदी ने भजन और विवाह गीत गाकर विवाह के हर्षोल्लास को और बढ़ा दिया। इस कथा में अरविंद त्रिपाठी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।






































