
श्रावस्ती में गुरुवार को शिक्षा विभाग से जुड़े शिक्षकों ने टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता के विरोध में प्रदर्शन किया। टीचर्स वेलफेयर एसोसिएशन के आह्वान पर बड़ी संख्या में शिक्षक जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) कार्यालय पर एकत्र हुए। इसके बाद उन्होंने कलेक्ट्रेट तक पैदल मार्च निकालकर अपनी मांगों के समर्थन में आवाज बुलंद की। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि आरटीई एक्ट 2009 देश में 1 अप्रैल 2010 और उत्तर प्रदेश में 27 जुलाई 2011 से लागू हुआ। उनका कहना है कि इस अधिनियम के लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी की अनिवार्यता लागू करना नियमों के विरुद्ध है। शिक्षकों का तर्क है कि पुरानी विज्ञप्तियों और शासनादेशों के आधार पर नियुक्त हुए शिक्षकों पर नई सेवा शर्तें थोपना न्यायसंगत नहीं है। शिक्षकों का यह आंदोलन पिछले कई दिनों से चल रहा है। 22 फरवरी को सोशल मीडिया पर ‘जस्टिस फॉर टीचर’ अभियान चलाकर इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया था। इसके बाद 23 से 25 फरवरी तक शिक्षकों ने काला फीता बांधकर शांतिपूर्वक शिक्षण कार्य करते हुए अपना विरोध दर्ज कराया। गुरुवार को यह विरोध सड़कों पर उतर आया। धरने को संबोधित करते हुए शिक्षक नेताओं ने कहा कि नियुक्ति के समय टीईटी की शर्त लागू नहीं थी, इसलिए अब इसे अनिवार्य करना असंवैधानिक है। उन्होंने इसे ‘खेल के बीच में नियम बदलने’ जैसा बताया और कहा कि यह शिक्षकों के सम्मान व अधिकारों पर प्रहार है। महिला शिक्षकों ने भी इस अनिवार्यता के कारण हो रहे मानसिक दबाव और असुविधा का मुद्दा उठाया। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने शीघ्र समाधान नहीं निकाला तो आंदोलन को जिला स्तर से आगे बढ़ाकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित किया जाएगा। पैदल मार्च के बाद शिक्षकों ने मजिस्ट्रेट के माध्यम से प्रधानमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में मांग की गई है कि आरटीई लागू होने से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से मुक्त रखा जाए और उनकी सेवा शर्तों को यथावत बनाए रखा जाए। शिक्षकों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।











































