यूपी-नेपाल बॉर्डर पर स्कूलों के नाम पर अवैध मदरसे:फिर खुल गए 500 से ज्यादा मदरसे; स्टिंग में खुलासा- विदेशी फंडिंग मिल रही

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मदरसा चला रहे… मान्यता नहीं है। प्राइवेट स्कूल की मान्यता लेंगे, ताकि साथ में दीनी तालीम (कुरान की पढ़ाई) भी दे सकें। यहां के कई लोग सऊदी में हैं… वे अपने घर पर पैसा भेजते हैं। फिर उनके परिवार वाले यहां जकात (चंदा) दे जाते हैं…। यह कहना है यूपी-नेपाल बॉर्डर पर अवैध मदरसा चलाने वालों का। यहां बीते साल अप्रैल से जून तक यूपी सरकार ने 542 अवैध मदरसों पर बुलडोजर चलाया और उन्हें बंद करा दिया। लेकिन, 500 से ज्यादा मदरसे फिर खुल गए। अब अवैध का टैग खत्म करने के लिए प्राइवेट स्कूल के नाम से रजिस्ट्रेशन कराने की तैयारी है। जिससे स्कूल की आड़ में मदरसा चलाया जा सके। इन अवैध मदरसों को जकात के नाम पर विदेशी पैसा भी मिल रहा है। दैनिक भास्कर के स्टिंग में मदरसा चलाने वालों ने खुद ये बात कबूल की। पढ़िए, पूरा इन्वेस्टिगेशन… हमें इनपुट मिला कि अवैध मदरसों पर बुलडोजर कार्रवाई के 7 महीने बाद फिर अवैध मदरसे खुल गए हैं। हमने नेपाल से सटे यूपी के 2 जिलों सिद्धार्थनगर और महराजगंज के बॉर्डर पर छानबीन की। यहां हमारे सामने 2 सवाल थे, जिनके जवाब के लिए हमने इन्वेस्टिगेशन शुरू किया – सबसे पहले जानिए, मदरसे क्यों गिराए? यूपी से सटे नेपाल बॉर्डर पर बने कई मदरसों पर प्रशासनिक कार्रवाई की थी। क्योंकि जांच में बड़ी संख्या में मदरसे बिना सरकारी मान्यता, बिना रजिस्ट्रेशन और सरकारी या ग्राम समाज की जमीन पर अवैध कब्जे के रूप में चल रहे थे। सीमा क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार ने माना कि इन मदरसों का कोई स्पष्ट शैक्षणिक रिकॉर्ड, छात्र-डेटा, फंडिंग स्रोत या निगरानी तंत्र नहीं है। इससे सुरक्षा और अवैध गतिविधियों की आशंका बनी रहती है। इसी आधार पर सर्वे कराकर मदरसों को सील किया, नोटिस जारी किए। जहां अतिक्रमण साबित हुआ, वहां निर्माण ध्वस्त कर दिया। जब हम धनौरा बुजुर्ग पहुंचे तो पता चला कि मदरसा गांव के बाहरी हिस्से में है। हम वहां पहुंचे तो पता चला कि मदरसा नूरुल इस्लाम चल रहा है। बच्चों को 2 टीचर पढ़ा रहे हैं। हमारी मुलाकात अब्दुल अली से हुई। अली ने बताया- जब कार्रवाई हुई, तब यह मदरसा बंद किया था। लेकिन अधिकारियों ने कागजी कार्रवाई पूरी करने का समय देकर खोलने को कहा था। इसी वजह से यह मदरसा चल रहा। यह बिल्डिंग काफी पुरानी है। हम लोग बाहर गांव के हैं, यहां पढ़ाने आते हैं। मदरसे की मान्यता के लिए कागजी कार्रवाई चल रही है। इसके बाद हम लोग धनौरा बुजुर्ग की मस्जिद पहुंचे। यहां हमारी मुलाकात गांव के मुअज्जिस (मुस्लिम जुबाम में ऐसे व्यक्ति, जो समाज में सम्मानित हो) करम हुसैन से हुई। उन्होंने स्वीकार किया कि विदेशों में रहने वाले गांव के लोग जकात के नाम पर मदरसे को फंडिंग करते हैं। रिपोर्टर: मदरसा अभी चल रहा, तो मान्यता वगैरह है या नहीं…? करम हुसैन: मदरसे की मान्यता अभी नहीं है… लेकिन हो जाएगी…? रिपोर्टर: छोटे बच्चों का ही मदरसा है क्या…? करम हुसैन: हां, छोटे बच्चों का ही है… एक से पांच क्लास तक का…। रिपोर्टर: मदरसे का प्रबंधन आप लोग ही देखते हैं क्या…? करम हुसैन: हां, गांववाले ही देखते हैं…। रिपोर्टर: आप फिर प्रबंधकों में शामिल हैं…? करम हुसैन: हां, हम भी हैं…। रिपोर्टर: क्या प्रशासन वाले आते रहते हैं…? करम हुसैन: हां, आते-जाते रहते हैं… SSB (सीमा सुरक्षा बल) वाले भी आते हैं…। रिपोर्टर: वह लोग क्या जानना चाहते हैं…? करम हुसैन: वे लोग जानना चाहते हैं कि कौन-सी किताब पढ़ाई जा रही। हम बताते हैं कि हमारे यहां साइंस… भूगोल सब कुछ पढ़ाया जा रहा है। रिपोर्टर: हिंदू बच्चे भी मदरसे में पढ़ने जाते हैं क्या…? करम हुसैन: हां, हिंदू बच्चे भी पढ़ने जाते हैं…। रिपोर्टर: …तो क्या आप लोगों ने प्रशासन से मदरसे को सुचारू रूप से चलाने के लिए टाइम ले लिया है…? करम हुसैन: हां, एक साल का टाइम मिला है…। रिपोर्टर: आखिरी बार प्रशासन के लोग कब आए थे? करम हुसैन: अभी डेढ़ महीने पहले आए थे। रिपोर्टर: कब से मदरसा चल रहा? करम हुसैन: यह मदरसा 1975 से चल रहा है… हम लोगों ने ही खुलवाया था। रिपोर्टर: अच्छा, फंडिंग कैसे होती है…? करम हुसैन: देखिए… धान का ढेर लगा हुआ है। 3 मास्टर हैं, वही पढ़ाते हैं। उन लोगों को 10-10 हजार रुपए देना होता है। गांव के लोग चंदा देते हैं, तब सैलरी देना होता है। रिपोर्टर: जकात से निकाल कर सैलरी देते होंगे? करम हुसैन: हां, जकात से निकाल कर देते हैं। रिपोर्टर: जो लोग विदेश में है, वो लोग भी भेजते हैं क्या… चंदा? करम हुसैन: हां, यहां के कई लोग सऊदी में हैं। रिपोर्टर: फिर वह लोग कैसे चंदा देते हैं? करम हुसैन: वे लोग पहले अपने घर पैसा भेजते हैं, फिर उनके परिवार वाले यहां पर जकात देते हैं। यहां से निकलकर हम बलरामपुर रोड पर मलगहिया गांव पहुंचे। यहां प्रशासन ने बुलडोजर से मदरसे को तोड़ दिया था। यह मदरसा गांव की मस्जिद के बगल में बना हुआ था। जब हम मौके पर पहुंचे तो वहां गांव के लोग इकट्ठा हो गए। जहां मदरसा तोड़ा था, वहां पर लोगों ने बताया कि यहां का मदरसा काफी बड़ा था। गांव के ज्यादातर बच्चे इसमें पढ़ते थे। बहरहाल, अब मदरसा एक दूसरे घर में चलाया जा रहा। मदरसे पर हमारी मुलाकात प्रबंधक अब्दुल रशीद से हुई। उन्होंने बताया कि मदरसा खलिहान की जमीन पर था। हालांकि, बाद में प्रशासन ने उसे अवैध घोषित कर दिया। इस वजह से इसे गिरा दिया। अब बच्चों को पढ़ाने के लिए जगह तो थी नहीं, लेकिन अब इसे फिर से कायम करने के लिए हमारी कोशिश जारी है। अभी हमने एक जगह ले रखी है। उसी जगह पर बच्चे पढ़ रहे हैं। चूंकि हमारे मदरसे की मान्यता भी नहीं थी। अब हमने स्कूल की मान्यता लेने के लिए आवेदन किया है। चूंकि अब यहां पर मैथ-साइंस सारे सब्जेक्ट पढ़ाए जाते हैं। इसलिए स्कूल में आवेदन किया है। हमने मदरसे के प्रिंसिपल मकबूल अहमद से भी बात की। मकबूल ने बताया कि हमारे बुजुर्गों ने 1962 में मदरसा बनाया था, लेकिन रजिस्ट्रेशन नहीं कराया था। जिसकी वजह से प्रशासन ने मदरसे को खलिहान की जमीन पर बना बताकर गिरा दिया। अब हम पब्लिक स्कूल के नाम पर मदरसे का रजिस्ट्रेशन कराकर इसे चलाने की कवायद में जुटे हैं। हम स्कूल में भी सभी सब्जेक्ट के साथ-साथ दीनी तालीम भी देंगे। वहीं हमारी मुलाकात इरशाद अहमद से हुई। इरशाद ने अपना मकान मदरसा चलाने के लिए दे रखा है। उन्होंने 1 हजार रुपए में 25 साल की लीज पर अपना मकान मदरसा चलाने के लिए दे रखा है। इरशाद कहते हैं कि मदरसा चलाने में अगर हमारी मदद हो जाएगी तो सबाब (पुण्य) भी मिलेगा। इसी वजह से हमने अपना मकान दे दिया है। हम यहां ज्यादा रहते भी नहीं हैं। गांव में ही हमारी मुलाकात मदरसे के खजांची मोहम्मद नसीम से हुई। नसीम साहब से हमारा सवाल था कि जब मदरसे की मान्यता नहीं थी तो बच्चे आगे कैसे पढ़ने जाते थे? टीसी वगैरह कहां से देते थे? नसीम बताते हैं कि ज्यादातर बच्चे मदरसे से पढ़कर आगे बड़े क्लास वाले मदरसों में ही जाते थे। ऐसे में बहुत ज्यादा लिखा-पढ़ी की जरूरत नहीं होती थी। गांव में हमारी मुलाकात प्रधान प्रतिनिधि साहिल खान से हुई। साहिल मदरसा गिराए जाने से प्रशासन से काफी नाराज हैं। कहते हैं- हम लोगों ने मदरसे को दूसरी जमीन पर शिफ्ट करने की अपील की थी, लेकिन प्रशासन की भाषा धमकी वाली थी। इसलिए हमें मदरसे को गिराना पड़ा। इसके बाद हमें जानकारी मिली कि बढ़नी ब्लाक के ही गांव परसा दीवान में एक मदरसा फैजल उलूम है। जिसे सरकारी सर्वे के दौरान ग्रामीणों ने बताया था कि यह बंद है। हालांकि, हमारे सोर्सेज ने बताया कि यह चल रहा है। ग्राउंड पर क्या रियलिटी है, इसको जानने के लिए हम मौके पर पहुंचे। ग्राउंड पर जब हम पहुंचे तो बच्चों ने बताया कि मदरसे में पढ़ाई चल रही है। हालांकि, जब हम गांव में पहुंचे तो कोई भी बोलने को तैयार नहीं हुआ। इसके बाद हमने हिडन कैमरे पर ग्रामीणों से बात की तो पता चला कि मदरसे के जो भी संचालक हैं, वो सब मुंबई में रहते हैं। यहां जो टीचर हैं, वो दूसरे गांव के हैं। हमने मोबाइल नंबर लेकर टीचर से बात की। टीचर मकसूद आलम ने बताया- गांववालों के चंदे से यह मदरसा चलता है। चूंकि रजिस्ट्रेशन नहीं है, क्योंकि मदरसे की मान्यता बंद है। ग्रामसभा की जमीन पर बना था मदरसा शिवभारी गांव में मदरसा और मस्जिद एक साथ थे। स्थानीय बताते हैं कि मदरसा ग्राम समाज की जमीन पर बना था। जिसकी वजह से प्रशासन ने गिरा दिया था। यह जगह नेपाल बॉर्डर से 10 किमी के अंदर है। यहां मस्जिद और मदरसा दोनों गिराया। कैसे, क्या हुआ? यह जानने के लिए हम गांव में नसीम से मिले। नसीम बताते हैं- कागजों में मदरसा बंजर भूमि पर दर्ज है, जबकि ये निजी जमीन है। कई चकबंदियां हुईं। इस बीच मदरसा बंजर भूमि पर घोषित कर दिया। इधर, गौरशंकर तिवारी, जिनकी जमीन और घर मदरसे के पास है। उन्होंने शिकायत दर्ज कराई कि उनकी जमीन पर कब्जा किया जा रहा, जबकि ऐसा नहीं था। अब सवाल था कि मदरसा गिरने के बाद बच्चों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ा है? इस सवाल के जवाब में नसीम कहते हैं कि जब मदरसा गिराया तो 120 बच्चे थे। दूसरा मदरसा 2 किमी दूर है, लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को सड़क पर भेजना खतरे से खाली नहीं। इसलिए ज्यादातर बच्चों का नाम सरकारी स्कूल में लिखाया। बुजुर्ग मुज्जमिल बताते हैं- गांव के गरीब लोग नहीं कर पाते हैं तो ऐसे बच्चों की तालीम पर असर पड़ा है। अब सवाल था कि आखिर यह मदरसा कैसे चल रहा था? इस सवाल के जवाब में मुज्जमिल बताते हैं- यह गांववालों के आपसी सहयोग से ही चलता है। अगर हमारे यहां 1 क्विंटल गेहूं हुआ तो जकात के रूप में हम 10 किलो गेहूं मदरसे को देते हैं। इसी तरह जो गांव के लोग बाहर रहते हैं, वह भी अपना हिस्सा भेजते हैं। इसके बाद हम धनौरी गांव पहुंचे। जहां हमें मदरसा बंद मिला। हालांकि लोगों ने बताया कि मदरसा चल रहा है। गांव में घुसते ही सबसे पहले मदरसा ही पड़ता है। जब हमारी टीम वहां पहुंची तो छुट्‌टी हो चुकी थी। ऐसे में हमारा लक्ष्य था कि कोई मदरसे से संबंधित व्यक्ति हमें मिल जाए, ताकि हमें मदरसे के बारे में डिटेल पता चल सके। इसके लिए हम गांव के अंदर गए। जहां हमे पता चला कि गांव में मदरसे में पढ़ाने वाले गुलाम वारिस गांव में ही रहते हैं। हमने उनसे बातचीत की। गुलाम वारिस ने बताया 6-7 महीने पहले प्रशासन के लोग आए थे। बोले थे कि मान्यता वगैरह करवा लीजिए। अब वह प्रोसेस चल रहा है। हफ्ते में 6 दिन मदरसे में क्लास चलती है। गांव के लोग दान करते हैं, जिससे मदरसा चलता है। अब चलिए, सोनौली बॉर्डर के गांवों में… इसके बाद हम बढ़नी नेपाल बॉर्डर से तकरीबन 100 किमी दूर महराजगंज जिले के सोनौली नेपाल बॉर्डर पर पहुंचे। प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक, सोनौली बॉर्डर पर 14 मदरसों पर कार्रवाई की थी। उनमें से हम दो गांव में पहुंचे। सबसे पहले हरदी डाली गांव में पहुंचे। हम जब गांव में पहुंचे तो मदरसा बंद हो चुका था। ऐसे में हमारी मुलाकात गांव के ही रमजान से हुई। रमजान ने बताया कि जब सारे मदरसे बंद किए जा रहे थे तो हमारा मदरसा भी सील किया गया। हम लोग कोर्ट गए तो रिलीफ मिल गया था। इसके बाद प्रशासन ने हमें मदरसा संचालित करने की अनुमति दे दी। साथ ही कहा गया कि जल्द से जल्द मान्यता ले लीजिए। अब हम स्कूल की मान्यता के लिए लगे हैं। इस मदरसे में सिर्फ दीनी तालीम ही नहीं, दूसरे सब्जेक्ट भी पढ़ाए जा रहे हैं। वहीं हमारी मुलाकात मुअज्जिन से हुई। इनके बच्चे भी मदरसे में पढ़ते थे। लेकिन, मदरसा बंद होने से इन्हें तीन किमी दूर नौतनवा कस्बे में स्कूल में बच्चों का एडमिशन कराना पड़ा। चूंकि मदरसा शुरू हो गया था, तो अब अगले सेशन से फिर अपने बच्चों को मदरसे में पढ़ाएंगे। स्कूल की मान्यता लेकर मदरसा चलाएंगे यहां से हम मुजहना मिलिक गांव पहुंचे। यहां के मदरसे में कभी 250 से ज्यादा बच्चे पढ़ा करते थे। मान्यता न होने के कारण मदरसे को प्रशासन द्वारा बंद किया। अभी मदरसा बंद चल रहा है। शिक्षक फजरे आलम ने बताया 1 मई को मदरसा बंद था। हमने हाईकोर्ट में केस लगाया है। दीनी तालीम के साथ हिंदी और अंग्रेजी पढ़ाएंगे। मान्यता बेसिक शिक्षा विभाग से कराएंगे। अब जानिए, मदरसों की मान्यता क्यों जरूरी? यूपी में मदरसा बोर्ड का सिलेबस और मान्यता इसलिए जरूरी है। जिससे मदरसे शिक्षा के नाम पर सिर्फ धार्मिक गतिविधि न होकर एक कानूनी और मानक शैक्षणिक संस्थान के रूप में काम करें। बोर्ड के तय सिलेबस से यह सुनिश्चित होता है कि दीनी तालीम के साथ हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और सामाजिक विषय भी पढ़ाए जाएं, जिससे बच्चों की शिक्षा गुणवत्तापूर्ण और आगे मान्य हो। मान्यता मिलने पर छात्रों को ऐसे प्रमाण-पत्र मिलते हैं, जो आगे की पढ़ाई और रोजगार के लिए स्वीकार्य होते हैं। जबकि बिना मान्यता वाले मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य अनिश्चित रहता है। इसके अलावा मान्यता प्रक्रिया के तहत छात्र संख्या, शिक्षक योग्यता, फंडिंग स्रोत और भूमि-भवन से जुड़े दस्तावेज सामने आते हैं। इससे निगरानी और पारदर्शिता बनी रहती है। अवैध फंडिंग या बाल अधिकार उल्लंघन जैसी आशंकाएं कम होती हैं। खासकर भारत-नेपाल सीमा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सरकार का मानना है कि बिना मान्यता वाले मदरसे बिना रिकॉर्ड छात्रों के ठहराव या संदिग्ध गतिविधियों की आड़ बन सकते हैं। इसलिए उन्हें नियामक दायरे में लाना जरूरी है। कुल मिलाकर, यह व्यवस्था धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं, बल्कि संविधान के तहत शिक्षा के न्यूनतम मानक, बच्चों के भविष्य और कानून-व्यवस्था की सुरक्षा सुनिश्चित करने का उपाय है। मदरसों में क्या पढ़ाया जाता है? कुछ मदरसों में केवल दीनी तालीम दी जाती है। इसमें कुरान शरीफ (अरबी में पढ़ना, याद करना), तजवीद (कुरान सही उच्चारण से पढ़ने के नियम), हदीस (पैगम्बर मोहम्मद के कथन), फिक्ह (इस्लामी कानून), अकीदा (इस्लामिक विश्वास), सीरत-ए-नबी (पैगम्बर का जीवन), अरबी भाषा (व्याकरण और साहित्य) पढ़ाया जाता है। अब जानिए जिम्मेदार अधिकारी क्या कहते हैं? स्कूलों में धार्मिक पाठ्यक्रम नहीं चला सकते सिद्धार्थनगर डीआईओएस अरुण कुमार ने बताया- जो भी हमारे यहां मान्यता का नियम है। उसी के आधार पर किसी को भी मान्यता दी जाएगी। यह बिल्कुल साफ है कि स्कूलों में धार्मिक पाठ्यक्रम नहीं चलाया जाएगा। अगर ऐसा करता पाया तो उसके ऊपर जरूरी कार्रवाई की जाएगी और मान्यता को निरस्त की जाएगी। धार्मिक पाठ्यक्रम चलाया तो कार्रवाई करेंगे महराजगंज डीआईओएस प्रदीप कुमार शर्मा बताते हैं- स्कूलों की मान्यता के लिए नियम हैं। अगर वह नियमों के तहत अप्लाई करते हैं तो उन्हें मान्यता दी जाएगी। हालांकि, उन स्कूलों में धार्मिक पाठ्यक्रम चलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। जो सब्जेक्ट नियमों में होंगे। उन्हीं को पढ़ाना होगा। किसी अवैध मदरसे को कोई मोहलत नहीं दी सिद्वार्थनगर के शोहरतगढ़ तहसील एसडीएम विवेकानंद मिश्रा ने कहा- आप के माध्यम से मामला संज्ञान में आया कि सील किए मदरसे फिर से चालू हो गए है। प्रशासन की तरफ से किसी भी मदरसे को बिना मान्यता चलाने की अनुमति नहीं दी गई है। अगर ऐसा कहीं पाया जाता है तो कार्रवाई की जाएगी। यदि अवैध मदरसे खुले हैं तो कार्रवाई करेंगे महाराजगंज जिले के नौतनवा तहसील एसडीएम नवीन प्रसाद ने बताया- जो मदरसे सील किए थे। उनमें से कुछ को कोर्ट के आदेश पर खोलने की छूट दी है। बाकी जो खुल रहे हैं वह अवैध हैं। अगर कोई कह रहा है कि स्कूल के रूप में मान्यता लेकर धार्मिक पढ़ाई कराएगा तो यह पूरी तरह गलत है। अगर ऐसा कोई करता पाया तो कार्रवाई होगी। ————————— ये खबर भी पढ़ें… 20 लाख में नेपाल की Gen-Z वर्जिन गर्ल:यूपी बॉर्डर पर महिला तस्करों का स्टिंग; खाड़ी देशों में बेच रहे अरे… बाबू साहब… लड़कियां चाहिए तो 10 क्या… 50… 100 दिला देंगे… फुल सर्विस (अननेचुरल सेक्स) वाली लड़कियां हैवी बॉडी की आएंगी… जो दुबली-पतली आएंगी… वो फुल सर्विस नहीं देंगी… सिर्फ नेचुरल सेक्स करेंगी… आपको ऐसी लड़कियां देंगे… जिनकी वर्जिनिटी के नाम पर आप कस्टमर से 5 लाख रुपए तक रोज ले सकते हैं… अच्छे-अच्छे पागल हो जाएंगे… एक लड़की पर मुझे 20 हजार इंडियन करेंसी मिलती है…। ये सौदेबाजी कम उम्र की नेपाली लड़कियों की खरीद-फरोख्त के लिए तस्करों से की जा रही है। नेपाली लड़कियों की तस्करी का अब तक सबसे बड़ा खुलासा करने के लिए ‘दैनिक भास्कर’ की टीम यूपी-नेपाल बॉर्डर से 30 किमी अंदर नेपाल के चंद्रौटा, भैरवा और भुटवल कस्बे पहुंची। यहां पहली बार महिला तस्करों का स्टिंग किया। इन्होंने ऑन-कैमरा बताया कि कैसे नेपाल के छोटे से गांव से लड़कियों को निकालकर यूपी के रास्ते देश के बड़े शहरों और खाड़ी देशों तक पहुंचाते हैं। पढ़ें पूरी खबर
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