परसा तिवारी में श्रीराम वन गमन कथा का वर्णन:कथावाचक ने त्याग, धर्म और धैर्य का महत्व बताया

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रुधौली विकास खण्ड क्षेत्र के परसा तिवारी स्थित बुढ़िया समय माता मंदिर में चल रही नौ दिवसीय श्रीराम कथा के आठवें दिन कथावाचक बिष्णुकान्त तिवारी ने राम वन गमन की कथा का वर्णन किया। उन्होंने श्रोताओं को इस अमृतमयी कथा का रसपान कराते हुए त्याग, धैर्य और धर्म के आदर्शों पर प्रकाश डाला। कथावाचक ने बताया कि रानी कैकेयी के दो वरदानों के कारण राजा दशरथ की आज्ञा से भगवान राम ने चौदह वर्षों का वनवास स्वीकार किया। यह घटना भारतीय संस्कृति में त्याग और धर्म का प्रतीक मानी जाती है। मंथरा के बहकावे में आकर रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या की राजगद्दी और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा था। पिता के वचन का पालन करने के लिए भगवान राम ने सहर्ष वन जाना स्वीकार किया। भगवान राम के साथ माता सीता और भाई लक्ष्मण भी वनवास के लिए गए। उन्होंने अयोध्या से निकलकर तमसा नदी, गोमती, गंगा (शृंगवेरपुर), चित्रकूट, दंडकारण्य, पंचवटी, किष्किंधा और अंततः रामेश्वरम् तक की यात्रा की। वनवास के दौरान राम ने उत्तर प्रदेश से लेकर तमिलनाडु तक विभिन्न ऋषि-मुनियों से भेंट की और उनके आश्रमों का भ्रमण किया। उन्होंने दुष्ट राक्षसों का संहार कर ऋषियों की रक्षा की। पंचवटी में ही रावण द्वारा माता सीता का हरण हुआ, जो कथा का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। बिष्णुकान्त तिवारी ने कहा कि श्रीराम का वन गमन त्याग, धैर्य और धर्म की स्थापना का आदर्श प्रस्तुत करता है। इस दौरान कथा व्यवस्थापक आदर्श तिवारी, राम चन्द्र तिवारी, पूनम तिवारी सहित कई अन्य लोग उपस्थित रहे।

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