सादुल्लाहनगर/बलरामपुर के विशुनपुर खरहना गांव में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा का समापन हो गया। कथा का विश्राम दिवस अत्यंत भावपूर्ण एवं भक्तिमय वातावरण में संपन्न हुआ, जिसका समापन भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के सखा श्री सुदामा जी के चरित्र वर्णन के साथ हुआ। आचार्य स्वामी इंद्रेश जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जी की निष्काम, पवित्र एवं आदर्श मित्रता का सुंदर वर्णन किया। उन्होंने बताया कि यह संबंध केवल मित्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि भक्त और भगवान के दिव्य संबंध का भी अनुपम उदाहरण है। आचार्य जी ने कथा के माध्यम से समझाया कि सच्चा मित्र वही होता है जो अभाव में भी प्रेम और विश्वास से जुड़ा रहता है। उन्होंने कहा कि भगवान अपने भक्तों के प्रेम के आगे स्वयं को समर्पित कर देते हैं। सुदामा जी की दरिद्रता में भी उनकी भक्ति और श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें दिया गया सम्मान श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणास्रोत बना। कथा के अंतिम चरण में आचार्य स्वामी इंद्रेश जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण के परमधाम गमन के पश्चात गंगा तट पर भगवान श्री शुकदेव जी द्वारा राजा परीक्षित को श्रीमद् भागवत कथा श्रवण कराए जाने का मार्मिक वर्णन किया। सातवें दिन कथा पूर्ण होने पर भगवान शुकदेव जी के आशीर्वाद से महाराज परीक्षित को सद्गति प्राप्त हुई और उन्हें भगवान का दिव्य बैकुंठ लोक प्राप्त हुआ। तत्पश्चात आचार्य जी ने विधिवत स्कंध पूर्ति कराई और यजमान शेष राम गुप्ता सहित समस्त श्रद्धालु भक्तों को अपना शुभ आशीर्वाद प्रदान किया। अंत में उन्होंने सभी से भागवत के आदर्शों को जीवन में उतारने का आह्वान करते हुए अपनी वाणी को विराम दिया। विश्राम दिवस पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे, जिससे पूरा वातावरण भक्ति और श्रद्धा से ओतप्रोत रहा।
विशुनपुर खरहना में भागवत कथा का समापन:आचार्य इंद्रेश महाराज ने सुदामा-कृष्ण मित्रता और भक्ति का महत्व बताया
सादुल्लाहनगर/बलरामपुर के विशुनपुर खरहना गांव में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा का समापन हो गया। कथा का विश्राम दिवस अत्यंत भावपूर्ण एवं भक्तिमय वातावरण में संपन्न हुआ, जिसका समापन भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के सखा श्री सुदामा जी के चरित्र वर्णन के साथ हुआ। आचार्य स्वामी इंद्रेश जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जी की निष्काम, पवित्र एवं आदर्श मित्रता का सुंदर वर्णन किया। उन्होंने बताया कि यह संबंध केवल मित्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि भक्त और भगवान के दिव्य संबंध का भी अनुपम उदाहरण है। आचार्य जी ने कथा के माध्यम से समझाया कि सच्चा मित्र वही होता है जो अभाव में भी प्रेम और विश्वास से जुड़ा रहता है। उन्होंने कहा कि भगवान अपने भक्तों के प्रेम के आगे स्वयं को समर्पित कर देते हैं। सुदामा जी की दरिद्रता में भी उनकी भक्ति और श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें दिया गया सम्मान श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणास्रोत बना। कथा के अंतिम चरण में आचार्य स्वामी इंद्रेश जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण के परमधाम गमन के पश्चात गंगा तट पर भगवान श्री शुकदेव जी द्वारा राजा परीक्षित को श्रीमद् भागवत कथा श्रवण कराए जाने का मार्मिक वर्णन किया। सातवें दिन कथा पूर्ण होने पर भगवान शुकदेव जी के आशीर्वाद से महाराज परीक्षित को सद्गति प्राप्त हुई और उन्हें भगवान का दिव्य बैकुंठ लोक प्राप्त हुआ। तत्पश्चात आचार्य जी ने विधिवत स्कंध पूर्ति कराई और यजमान शेष राम गुप्ता सहित समस्त श्रद्धालु भक्तों को अपना शुभ आशीर्वाद प्रदान किया। अंत में उन्होंने सभी से भागवत के आदर्शों को जीवन में उतारने का आह्वान करते हुए अपनी वाणी को विराम दिया। विश्राम दिवस पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे, जिससे पूरा वातावरण भक्ति और श्रद्धा से ओतप्रोत रहा।





































