समाजसेवी सुदामा 18 मार्च से मनोरमा नदी की सफाई करेंगे:पंडूलघाट के झुंगीनाथ में, कलेक्ट्रेट बैठक में लिया गया निर्णय

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विक्रमजोत: जनपद के चर्चित समाजसेवी और भाजपा नेता चंद्रमणि पांडे “सुदामा” ने पंडूलघाट स्थित झुंगीनाथ में मनोरमा नदी की सफाई का अभियान शुरू करने की घोषणा की है। यह अभियान 18 मार्च से शुरू होकर तीन दिनों तक चलेगा। इससे पहले मखौड़ा धाम में भी उनके सफल सफाई प्रयास किए गए थे। सुदामा दशकों से मनोरमा सहित जनपद की अन्य नदियों की स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। उन्होंने 2017 में पचवस आए मुख्यमंत्री को ज्ञापन देकर घाघरा को मनोरमा से जोड़ने की मांग उठाई थी। 2018 में, उन्होंने मखौड़ा धाम में मंदिर निर्माण और मनोरमा की सफाई के लिए एक सप्ताह का आमरण अनशन किया था, जिसके परिणामस्वरूप तत्कालीन प्रशासन ने सफाई में भागीदारी की थी। इन प्रयासों के बावजूद, नदी में जलकुंभी और गंदगी की समस्या बनी रही। सुदामा ने नदी में अपशिष्ट डालने से रोकने के लिए हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और लगातार जन जागरूकता अभियान चलाकर प्रशासन को इस मुद्दे पर जागरूक किया। कल कलेक्ट्रेट सभागार में अधिकारियों के साथ हुई एक बैठक में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। तय किया गया कि रामनवमी से पहले प्रमुख स्थलों के पास लगभग दस किलोमीटर मनोरमा नदी की सफाई सुनिश्चित की जाएगी। शेष क्षेत्र के लिए एक ठोस रणनीति बनाई जाएगी। सुदामा ने जिला प्रशासन को टीम गठित करने के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि यदि प्रशासन दृढ़ता से कदम उठाएगा तो बस्ती देश के लिए प्रेरणा स्रोत बन सकता है। सुदामा ने इस अवसर पर पूर्व के अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के कार्यों पर कई सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या पूर्व में जिला प्रशासन ने मनोरमा के लिए कोई कार्ययोजना बनाई थी? बीते दो दशकों में केंद्र और प्रदेश से आए धन का सदुपयोग हुआ या नहीं? मुख्यमंत्री के निर्देश और तत्कालीन जिलाधिकारी की सहभागिता के बावजूद नदी जलकुंभी मुक्त क्यों नहीं हुई? उन्होंने आगे पूछा कि कार्ययोजना अधूरी रहने के बावजूद क्रियान्वयन क्यों बंद हुआ? अतिक्रमण हटाने और अपशिष्ट रोकने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए? मनोरमा तट पर मांस-मछली की दुकानों और अपशिष्ट के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई? जनता को नदी में कचरा न डालने के लिए जागरूकता अभियान क्यों नहीं चलाया गया? साथ ही, मूर्ति विसर्जन और धार्मिक आयोजनों के बाद कचरे का उचित निस्तारण क्यों नहीं हुआ?
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