
बस्ती में बाल कल्याण समिति (सीडब्लूसी) ने पैकोलिया थाना के एक उप निरीक्षक (एसआई) को छह माह के लिए समिति के समक्ष प्रतिबंधित कर दिया है। समिति ने पुलिस अधीक्षक को पत्र भेजकर संबंधित उप निरीक्षक का किशोर न्याय (जेजे) अधिनियम का अनिवार्य प्रशिक्षण कराने और इस अवधि में उन्हें बाल अधिनियम से संबंधित कोई भी विवेचना न सौंपने का निर्देश दिया है। यह मामला पैकोलिया थाना क्षेत्र के एक गांव से जुड़ा है, जहां एक व्यक्ति ने अपनी नाबालिग बेटी के घर से गायब होने की सूचना थाने में दी थी। पुलिस ने मामला दर्ज कर बालिका को बरामद कर लिया था। बरामदगी के बाद मामले के विवेचक अभोरिक यादव ने बालिका को न्याय पीठ के समक्ष प्रस्तुत किया। बालिका को प्रस्तुत करते समय उप निरीक्षक यादव वर्दी में थे, और बालिका के प्रति उनका व्यवहार बाल-मित्रवत न होकर असामान्य था। सुपुर्दगी की कार्यवाही के दौरान वे प्रक्रिया का पालन करने में भी अक्षम रहे। जब न्याय पीठ के सदस्य ने उनसे पूछताछ की, तो उन्होंने बताया कि उन्हें प्रक्रिया की जानकारी नहीं है और उन्हें थाने से भेज दिया गया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए, सीडब्लूसी के चेयरपर्सन प्रेरक मिश्रा, सदस्य अजय श्रीवास्तव, डॉ. संतोष श्रीवास्तव और मंजू त्रिपाठी ने यह निर्णय लिया। समिति का मानना था कि इस उप निरीक्षक द्वारा विवेचना किए जाने से बालिका का सर्वोच्च हित प्रभावित होगा। सर्वसम्मति से यह तय किया गया कि विवेचक को बाल अधिनियम 2015 का अनिवार्य प्रशिक्षण कराया जाए। प्रशिक्षण पूर्ण होने तक उन्हें बाल अधिनियम से संबंधित सभी प्रकार के कार्यों से दूर रखा जाए और बालक-बालिकाओं से संबंधित कोई भी विवेचना न दी जाए। साथ ही, उन्हें सीडब्लूसी के समक्ष छह माह के लिए प्रतिबंधित कर दिया जाए। इस आशय का आदेश पुलिस अधीक्षक को भेज दिया गया है, जिसमें कृत कार्यवाही से न्याय पीठ को अवगत कराने के लिए भी कहा गया है। इस संबंध में बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष प्रेरक मिश्रा ने कहा कि बालक/बालिका का सर्वोच्च हित उनके लिए सर्वोपरि है और इसके साथ खिलवाड़ करने की अनुमति किसी को भी नहीं है।
































